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Wednesday, 29 August 2018

नन्ही चिड़िया - Inspiration Story | Conclusion

August 29, 2018 0 Comments
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Mera Aqsh - Inspiration Story
मैं थोड़ा उदास हो गया उसे वह न देख कर तभी अचानक से वो ची ची की आवाज करते हुए उसी पेड़ पर लोट आयी उसकी चोंच में कई तिनके थे ! शायद वह फिर से अपना घोसला बनाने वाली थी और देखते ही देखते उसने दिन भर तिनके इकठ्ठे करके अपना घोसला बनाना शुरू कर दी पर इस बार उसने अपना घोसला दूसरी डाल पे बनाई क्योकि पहली डाल तो टूट चूका था ! वो दिन भर काम करती रही मैंने घर वालो से कह कर उसके लिए अपनी खिड़की पर दाने रखवा दिए ताकि उसे कही दूर न जाना पड़े अपने खाने की तलाश में वो काम करती रही और मैं उसे देखता रहा ! वो बड़ी बारीकी से अपना काम कर रही थी एक एक तिनके को ऐसे एक दूसरे के साथ मिला रही थी जैसे एक चादर बुनने वाला धागों के क्रम को बड़ी सटीकता से करता है ठीक वैसे ही जैसे कपड़ो पे कढ़ाई की जाती है ! इससे पहले मैंने कभी इस पर धयान नहीं दिया कुछ देर बाद मेरी आँख कैसे लगी मुझे पता ही नहीं चला सुबह मुझे ची ची की आवाज़ सुनाई दी मैं जाग गया देखा वो चिड़िया मेरी खिड़की पे बैठी है !

मैंने उसके घोसले की तरफ देखा तो वह बन कर तैयार हो चूका था वो पहले वाले से बड़ा और ज्यादा मजबूत लग रहा था ! मैंने उस नन्ही चिड़िया से कहा - ओ तो तुम मुझे अपना घर दिखाना चाहती हो काफी खूबसूरत है तुम्हारा घर तुमने बहुत मेहनत की है इसके लिए है न ! वो बस खिड़की पे बैठी रही और ची ची की आवाज़ करती रही ऐसे जैसे वो मेरी बातो का जवाब दे रही हो शायद मेरा दिमाग ख़राब हो चूका है जो एक चिड़िया से बाते कर रहा हूँ और उससे उम्मीद कर रहा हूँ की वह मेरी बात को समझे और उसका जवाब दे ! तुम कितनी खुश किस्मत वाली हो तुम जहा चाहो वहा जा सकती मगर मैं नहीं हा कभी मैं भी दुनिया देखना चाहता था पर काम से फुर्सत ही नहीं थी आज फुर्सत है तो कही जाने के लायक ही नहीं ! खैर तुम्हे भूक लगी होगी तुमने कुछ खाया की नहीं, तभी दरवाजे पे दस्तक हुई अम्मी अंदर आयी तुम किस्से बाते कर रहे हो बीटा ? कुछ नहीं बस उस चिड़िया से देखिये उसने कितना खूबसूरत घोसला बनाया है अपने लिए, इसका पहला वाला घोसला बारिश और हवा के चलते बिखर गया था और वो डाल भी टूट गयी !

कुछ देर अम्मी मुझसे बाते करती रही फिर वो निचे चली गयी काम करने मेरी इस हालत को देख कर अम्मी उदास हो जाती है पर इसमें न तो मैं कुछ कर सकता था और न ही वो ! बारिश होने वाली है मैं उस नहीं चिड़िया के लिए थोड़ा परेशां भी हूँ पिछली बार उसका घोसला बिखर गया था इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए ये सोच कर बस उसके लिए दुआ कर दी ! उसका घोसला सही सलामत था मुझे यह देख कर काफी खुसी हुई कुछ दिन बीते और फिर एक रोज जब मैं सुबह उठा और खिड़की के बाहर जैसे ही देखा तो वह घोसला वहा नहीं था मैं थोड़ा परेशान हुआ मैंने जोर से अम्मी को आवाज लगाया और वो ऊपर, क्या हुआ तुम्हे ? अम्मी खिड़की से बाहर झाँक कर देखिये क्या उसका घोसला फिर से बिखर गया है ? तुम क्या कह रहे हो मैं कुछ समझी नहीं ? उस चिड़िया का घोसला देखिये की वो क्या बिखर गया है या निचे गिर गया है ! अम्मी निचे बाहर देख कर बोली माफ़ करना बेटा उसका घोसला टूट चूका है , मैं उदास हो गया !

कई दिनों तक वह मुझे दिखी नहीं मैं और परेशान होने लगा मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई मेरा अपना मेरा साथ छोड़ गया हो मैं उसके बारे में बहुत ज्यादा सोच रहा था ! तभी एक शाम वो वापस आयी मेरी खिड़की पे उसके मुँह में फिर से कुछ तिनके थे ! मैं हैरान था - क्या तुम फिर से अपना घोसला बनाने वाली हो और वो भी उसी जगह देखो अगर तुम चाहो तो तुम यहाँ मेरे कमरे में रह सकती हो ! उसने अपने चोंच में दबे तिनके को खिड़की पे राखी और कुछ बोला उसने ची ची ची मैं समझ नहीं पाया की वो क्या कहना चाह रही है और वह फिर से उड़ कर उसी पेड़ पर जा बैठी और फिर शुरू हुई उसकी कारीगरी वह दिन रात मेहनत करती रही और देखते ही देखते फिर से घोसला तैयार हो गया ! मैं उसे देख कर हैरान था एक नन्ही सी जान जिसकी ज़िन्दगी शायद कुछ ही सालो की होगी वह इतना संघर्ष कर रही है सिर्फ अपने घर के लिए यह सब देख कर मैं हैरान था !

यह सब देख कर मुझे एक सिख मिली ज़िन्दगी चाहे छोटी हो या बड़ी उसे खुल कर जीना चाहिए और उस ज़िन्दगी में चाहे जितनी भी मुश्किलें आये उसका डट कर सामना करो आप हारोगे गिरोगे बार बार फ़िसलोगे मगर आपको रुकना नहीं है आपको बस वही करते जाना है ! जो आप करना चाहते है दुनिया क्या कहती है क्या करती है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता फर्क सिर्फ इस बात से आपको पड़ता है की आप क्या करना चाहते क्या पाना चाहते किससे प्यार करना चाहते है ये ज़िन्दगी आपकी है इसलिए आप यह तय करेंगे की आप अपनी ज़िन्दगी कैसे जीना चाहते है क्या आप बहादुरी के साथ ज़िन्दगी में आयी बड़ी से बड़ी तूफ़ान से सीधे टकरा जाना चाहते है या फिर उससे बचने के लिए भागना चाहते है आप बुजदिल बन कर जीना चाहते है या एक योद्धा की तरह वीर की तरह मरना चाहते है ! मैं इस बेड पर अपनी सारी ज़िन्दगी नहीं गुजारने वाला मैं बाहर जाऊंगा घूमूँगा जो मन में आएगा करूँगा प्यार करूँगा एक अच्छी ज़िन्दगी के लिए जो करना पड़े मैं करूँगा मैं हार नहीं मानुगा मैं हार नहीं मानुगा मैं हार नहीं मानुगा !

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Md Danish Ansari

Monday, 27 August 2018

नन्ही चिड़िया - Inspiration Story | Begining

August 27, 2018 0 Comments
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Mera Aqsh - Nanhi Chidiya | Inspiration Story
घर के पास एक बिहि के पेड़ पर एक नन्ही सी चिड़िया का घोसला था ! वो अक्सर सुबह पहले उठती और देर शाम को वापस अपने बसेरे पर आ जाती इस घोसले को बनाये अभी उसे कुछ ही महीने हुए थे ! उसका घोसला मेरे बेड के पास से ही लेटे हुए अपने बाजु वाली खिड़की से देख सकता था ! छुट्टी वाले दिन कभी कभार मेरी नज़र उसके घोसले पर पड़ती तो वो कभी खाली होता तो कभी वो नन्ही सी चिड़िया उसमे उछल कूद कर रही होती तो कभी उसमे कुछ और तिनके बुन रही होती ! यह सब जब मैं देखता तो अजीब सा एहसास होता ऐसा सुकून महसूस होता जैसे कोई धीरे धीरे आपको ख़ुशी दे रहा हो और आपको उसमे मज़ा आ रहा है लेकिन आप उसे बता नहीं सकते और न ही किसी को समझा सकते है !

इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में जब थक हार कर अपने कमरे में वापस लौटता तो अपने बेड पे जाते ही नज़रे कभी कभी उसे ढूंढ़ने लगती ! गर्मी का मौसम आ गया जबरदस्त गर्मी पड़ रही थी ! एक दोस्त ने मुझे मैसेज किया  की गर्मी का वक़्त है थोड़ा सा अनाज और पानी परिंदो के लिए छत पर रखा करो क्योकि वो प्यासे और भूके मर जाते है ! मैंने हलके से झुक कर खिड़की के बाहर देखा तो वो चिड़िया वही थी ! उसकी चहचहाट बहुत खूबसूरत थी कभी कभी तो वो मेरे खिड़की के पास आ बैठती तो मैं उसे बस देखते रहता की आखिर ये करना क्या चाहती है ! वो इधर से उधर फुदकते रहती मुझे अच्छा लगता था मैंने उसके लिए अपनी खिड़की के पास अनाज और पानी रख छोड़ा था ! वो अक्सर आती दाना चुगति और हलकी सी आवाज़ पर भी फुर से उड़ जाती !

दिन यूँही गुजरते गए और बारिश का मौसम आ गया मुझे बारिश बहुत पसंद है और भीगना भी मैं जानता हूँ ज्यादातर लोगो को बारिश का मौसम पसंद नहीं पर मुझे पसंद है ! एक दिन मैं अपने दोस्त के घर से लौट रहा था रात काफी हो चुकी थी और जोरो की बारिश हो रही थी ! मैं फिर भी बाइक धीरे धीरे चलाता रहा ! भीग भी रहा था अचानक से हवा तेज़ हो गयी तो ढंड लगने लगी हाँथ भी कापने लगे ! मैं धीरे धीरे बढ़ता रहा तभी अचानक से टायर स्लीप हुआ मैंने गाड़ी को संभालना चाहा मगर गलती से एस्क्लेटर दे दिया और मेरी बाइक सीधे साइड में लगे लोहे डिवीडर से टकराया और मैं फैका गया ! मुझे पैरो में काफी चोट लगी थी खून बह रहा था पर मैं उठ नहीं पाया बहुत कोशिश करने के बाद भी नहीं फिर बेहोश हो गया ! सुबह आँख हॉस्पिटल में खुली फिर मेरे दोस्तों ने मुझे घर पहुँचाया डॉक्टरों का कहना था की रात भर मेरा खून बहता रहा जिससे मेरे शरीर में खून की कमी हो गयी साथ ही पैर की कुछ खास नशों को ज्यादा चोट लगी जिससे खून बहुत बहा और वह सिकुड़ कर एक दूसरे से चिपक सी गयी यही वजह थी की मुझे अपने सीधे पैर में जान महसूस नहीं हुई !
डॉक्टर तो यहाँ तक बोल गए की शायद ये पैर अब कभी काम न करे मैं इस बात को लेकर काफी परेशान रहता ! फिर एक दिन बिस्तर पर लेटे लेटे अचानक से मुझे उस नन्ही चिड़िया का ख्याल आया तो मैंने खिड़की से बाहर देखा तो उसका घोसला वहा नहीं था वो डाल शायद उसी तूफ़ान में टूट गया था जिस दिन मेरा एक्सीडेंट हुआ था !

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Saturday, 7 July 2018

उस पेड़ की छाँव

July 07, 2018 0 Comments
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Mera Aqsh
घर के बाहर थोड़ी दूर पे एक विशाल बड़ (बरगद) का पेड़ है वो इतना विशाल है कि उसकी शाखाओं के नीचे आस पास के कई घर आते थे अक्सर बारिश के मौसम में लोगो को अपने घरों की छत को साफ करना पड़ता था क्योंकि उसकी पत्तियाँ छत पे पानी को बहने नही देती थी। गर्मी के मौसम में सब उसके नीचे जा कर आराम करते लाइट गोल होती तो उसके चबूतरे पर लोग लेटे रहते उसकी शाखाओं पर मधुमखियों के कई छत्ते थे जो शहद से भरे रहते हर सुबह और शाम को अलग अलग तरह की चिड़ियों की आवाज़ होती वो उसी पर रहते फिर एक दिन जोर की हवा चली और उसकी एक डाल टूट कर नीचे गिर गई कोई जख़्मी नही हुआ और न ही किसी का घर टुटा मगर लोगो के दिलों का डर उस पेड़ के लिए मुसीबत हो गई पहले उसकी एक शाख को काटा गया लोग उसे लेकर अब बुरा भला ही बोलते की ये पेड़ यहाँ नही होना चाहिये वगेरा वगैरा और देखते ही देखते वह बड़ का पेड़ सूखने लगा उसकी शाखाएँ सुख गयी लोगो ने उसे कटवाना शुरू किया और देखते ही देखते उस पेड़ का सिर्फ अब तना ही रह गया। अब न तो मधुमखियों के छत्ते है और न ही सुबह शाम को चिड़ियों की आवाज़ बस एक खामोशी है वो पेड़ अब बढ़ नही रहा उसकी तने पे कुछ पत्तियाँ फूटती तो है फिर सुख कर झड़ जाती है। शायद वह अब डर गया है उसने इंसान की कुल्हाड़ी की धार जितनी महसूस न कि होगी उससे ज्यादा उनकी जली कटी बाते महसूस की होगी। इस साल गर्मी में जब सूरज ने आग बरसाया तो सबको उस पेड़ की छाँव याद आ ही गई।
यह सब देख कर मुझे अपने अंदर का वो हिस्सा नज़र आया जो हम इंसान अक्सर सभ्य दिखने के लिए छुपाने की कोशिश करते है। वह पेड़ न जाने कितने सालों से वहाँ था न जाने उसने कितनी बारिशें देखी होंगी वह पेड़ उस जगह पर तब से था जब वहा इंसान की बस्ती तो क्या कोई इंसान भी नही था। अब सब कहते है अरे ये पेड़ था तो कितना सुकून था अब सभी को उस पेड़ की छाँव याद आती है।
नोट: यह लघु कथा सच्ची घटना पर आधारित है।

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Md Danish Ansari

Tuesday, 5 June 2018

शुक्रिया | Thanks

June 05, 2018 0 Comments

लगभग शाम हो ही चली थी सूरज क्षितिज पे था मौसम सुहाना था खुशनुमा था मैं अपने दुकान में बैठे बैठे लोगो को आते जाते देखता रहा सुबह से शाम हो गयी और अभी तक मैंने दिन की पहली बोहनी नही किया था बार बार मैं आज के दिन को लेकर दुखी हो जाता फिर आसमान पर जैसे ही नज़र पड़ती दिल खुश हो जाता बहुत ही खूबसूरत सुहाना मौसम था ! मैं जवान था इसलिए यह ख्याल आया काश इस सुहाने मौसम में हमसफ़र साथ होता तो ये शाम और भी खूबसूरत होती फिर कुछ देर बाद मैंने मन ही मन में ये कहा छोडो यार ये इश्क़ फरमाने की बातें जब ज़ेब और पेट खाली हो तो ये इश्क़ और मोहब्बत ही साँप और बिच्छू बन कर डसने लगते है ! उसके बाद मैंने आँख बंद करके खुदा से दुआ करने लगा ए मेरे मालिक ए सारे कायनात को बनाने वाले इसके कर्ता धर्ता क्या तेरे इस गुनहगार बन्दे को आज क्या खाली हाँथ ही लौटा देगा क्या तू मुझसे इतना ख़फ़ा है की तू अपने बेसुमार खजाने से मुझे एक बून्द भी अता नही कर सकता मेरे गुनाहों को माफ़ कर मेरे मालिक और अपने इस गुनहगार बन्दे को अपने खजाने से कुछ हलाल-ए-रिज़्क़ अता कर दे ! इतनी सी दुआ करके मैंने अपनी आँख खोला तो देखा सामने एक खातून खड़ी है मेरे तरफ पीठ करके दूकान में कुछ देख रही है, मैं फ़ौरन कह उठा आपको कुछ चाहिए और वो पलटी मैं बस वही चित हो गया उसने सामान जो ख़रीदा सो ख़रीदा मैंने उस खातून के बेग में उसके ख़रीदे सामान के साथ अपना दिल भी पैक कर दिया और मुझे खबर भी न हुई आज वो खातून मेरी ज़िन्दगी और मौत दोनों जहाँ में हमसफ़र है और हम आज मिट्टी के छः फुट गड्ढे में दफ़्न है ! शुक्रिया ज़ुलेखा मेरा साथ निभाने के लिए शुक्रिया युसूफ मुझे अपने सफर का हमसफ़र बनाने के लिए शुक्रिया मेरे मौला हमे ये खूबसूरत ज़िन्दगी देने के लिए और शुक्रिया मौत से मिलाने के लिए मौत के बगैर ज़िन्दगी अधूरी है जैसे मैं और तुम !

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Md Danish Ansari

Tuesday, 29 May 2018

दरख़्त | Darakht

May 29, 2018 0 Comments

कई हज़ारो साल पहले इस ज़मीन पर एक बाहरी दुनिया से एक बीज आया और इसकी सतह से टकरा गया बारिश हुई और वह अंकुरित होने लगा और फिर धीरे से एक पौधा बना धीरे धीरे हवा पानी मिटटी और रौशनी ने इसे सिचा और वह धीरे धीरे बढ़ता हुआ आखिर एक विशाल दरख़्त में बदल गया! इस दरख़्त का फल बाकि आस पास मौजूद दरख्तों से ज्यादा मीठा और रसदार था इसके एक फल से ही आपका पेट तो भर जाता मगर आपका मन नहीं भरता धीरे धीरे इसकी शाखाये बढ़ती गयी इसके बीज दूर दूर तक फैलते गए और देखते ही देखते पूरा एक जंगल तैयार हो गया हरा भरा और खूबसूरत जंगल दूर दूर से जानवर परिंदे सब यहाँ आ कर रहने लगे जिससे इस जंगल की खूबसूरती और बढ़ गयी यहाँ हर तरह के जानवर थे चाहे वो शाकाहारी हो या मांसाहारी ! सभी जानवर मिल जुल कर रहते थे सभी अपनी प्रकृति के अनुसार ही व्यवहार करते थे ! मांसाहारी जानवर शाकाहारियों को खाते और शाकाहारी जानवर पेड़ पौधो को खाते और इस तरह पूरी एक खाद्य श्रृंखला निर्मित हो गयी फिर उन्ही में से कुछ ऐसी प्रजातियां भी पनपी जो इन दोनों को खाती थी और इस तरह से यह जंगल फलने पलने लगा फिर अचानक से कुछ जानवरो ने अपनी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करना बंद कर दिया उसने बाकि जानवरो पर अपना दबाव बनाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे पुरे जंगल में इसी तरह के व्यवहार सभी में आने लगा और जंगल के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग जानवरो और परिंदो ने कब्ज़ा कर लिया फिर उन जानवरो में आपसी संघर्ष हुआ क्योकि पुरे जंगल में हर चीज हर जगह नहीं थी और अपनी जरूरतों के लिए वो एक दूसरे पे हमला करने लगे इसी तरह सब चलता रहा साल बीते और सदियाँ बीती मगर खाना बदोशी जंगो का सिलसिला नहीं रुका कुछ परिंदो ने समझदारी दिखाई और शांति बहाल करने की नियत से उनमे आपसी समझौते करवाए मगर इसके बावजूद बेवजह क़त्ल होते रहे और पुरे जंगल की जमीन पर लहू की मोटी परत जम गयी यह परत साल दर साल बनती रही और फिर बारिश का पानी जंगल में न ठहर सका और दरख़्त मरने लगे जंगल के उस सबसे पुराने पेड़ ने आसमान से मदद मांगी मगर आसमान के बेतहासा बारिशों के बाद लहू की वो मोटी परत तो जरूर ढीली हो गयी मगर इसका असर और भयानक हो गया लहू में मौजूद नमक पानी में घुल कर मिटटी को खारा बना दिया अब और देखते ही देखते जंगल मरने लगा और अपने ही अंदर सिमटने लगा मिटटी अब उपजाऊ नहीं रही और देखते ही देखते सारा जंगल तबाह हो गया और वो सभी जानवर और परिंदे भी तबाह हो गए जो सालो से आपस में लड़ रहे थे और वो दरख़्त भी धीरे धीरे मर गया उसकी ये हालत देख आसमान खूब रोया इतना रोया की ज़मीन की घिसावट शुरू हुई और पानी ने उसे बहा कर उसे अथाह गहराई के खाई में इकठ्ठा होने लगा और देखते ही देखते खारे पानी का विशाल दरिया बन गया और जमीन पहले की तरह उपजाऊ हो गयी खाना बदोशी जंग और संघर्षो के बिच कुछ बीज जमीं में दबे हुए थे और फिर वो अंकुरित हुई और एक पौधे की शक्ल लेने लगा आसमान ज़मीन हवा और रौशनी ने उसे सहारा दिया और वह धीरे धीरे बड़ा होते हुए एक विशाल दरख़्त में तब्दील हो गया और फिर से जमीन हरी भरी और बेसुमार खूबसूरती में तब्दील हो गयी ! 

सिख : इस पूरी कहानी में इंसान वो जानवर है जिसने जंग शुरू की और खुद की तबाही का ज़िम्मेदार बना हम वो जानवर है जो धर्म , जाति , सम्प्रदाय , संस्कृति , राजनैतिक , आर्थिक , सामाजिक , खान , पान , वेश , भूषा , बोली , भाषा , रहन , सहन , वैचारिक और न जाने किन किन वजहों की वजह से एक दूसरे से जंग लड़ रहे है और वो खूबसूरत दरख़्त यानि हमारी ज़मीन अब धीरे धीरे मर रही है आसमान चाहे जितना बरसे वह पानी अब इसपर ठहरता नहीं है और जा मिलता है तेज़ी से अथाह गहराई वाले खारे समंदर में !


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Md Danish Ansari

Sunday, 27 May 2018

|| शैतान का मुँह ||

May 27, 2018 0 Comments

आज सुबह जब उठा तो हर रोज़ की तरह सब कुछ ठीक ही था कुछ वक़्त हुआ ही था मुझे उठे हुए की अम्मा और मझले भाई में बहस शुरू हो गयी अम्मा को मझले भाई की हरकते पसंद नहीं वो घर का कोई भी काम नहीं करता उसके लिए ये घर एक होटल की तरह है और खून के रिश्ते उसके सेवक है और वो कस्टमर, बैड से उठा आँगन की तरफ गया तो बड़ा भाई न जाने सुबह सुबह किससे बहस में लगा हुआ था घंटो गुजर गए और वह मोबाइल में सामने वाले से किसी बात पर बहस करता रहा यहाँ लोग सुबह उठते ही अपने काम के लिए दौड़ लगाते है और यहाँ सब लोग बहस में लगे हुए थे मन किया सबको चिल्ला कर बोलूँ बस करो बहुत हो गया फिर सोचा अगर मैंने अपनी जबान खोली तो फिर मैं भी इसी बहस का हिस्सा हो जाऊंगा बाथरूम में नहाते नहाते ये ख्याल आया, लगता है आज सब शैतान का मुँह देख कर उठे है कब से एक दूसरे के खिलाफ मुँह बाए हुए है और एक दूसरे को समझने की कोशिश भी नहीं कर रहे बस आग उगल रहे है शैतान के मुँह में जहन्नम की आग की तरह लपट रहे है ये सोचते हुए मैं चुप चाप खुदा का नाम ले कर अपने काम पर चला गया !

सीख : अपनी ज़बान पर काबू रखो जब बहस की स्थिति बने तो अपनी जबान पे ताले जड़ दो जहन्नम में सबसे ज्यादा बदजुबानी लोग होंगे !

Md Danish Ansari

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Saturday, 14 April 2018

सत्य मेव जयते

April 14, 2018 0 Comments
Pic Source : City JK FM

हमारे देश में तीन सेनाये पहले से है जो हम सबकी हिफाजत करती है बड़ी ही मुस्तैदी से 24 * 7 घंटे ये सेना है - थल सेना , जल सेना और वायु सेना। इन तीन सेनाओं के अलावा इस देश में और भी बहुत सारी सेनाये जन्म ले रही है कुछ धर्म का नाम लेकर कुछ जाति का नाम लेकर कुछ सम्प्रदाय का नाम लेकर कुछ संस्कृति का नाम लेकर इन सेनाओं के नाम कुछ इस तरह है फलाना सेना , ढिमका सेना , ताऊ सेना , मौसी रक्षा सेना , चाचा धर्म सेना , खाला की रक्षा सेना वगेरा वगेरा वगेरा। 
ये सेनाये असल में सेनाये कम और गुंडे मवालियों की भीड़ ज्यादा है ये गुंडे और मवालियों की भीड़ किसी के साथ इन्साफ नहीं करती ! एक लड़की स्कूल से घर वापस जाती है और रस्ते में कुछ मजदुर उसे रोक के कहते है की उनके पास उसके आपत्ति जनक फोटोज है अगर वह उनकी बात नहीं मानती है तो वह उसे सोशल मीडिया पर डाल देंगे।  लड़की ने इस बात की शिकायत अपने घर वालो के साथ मिलकर पुलिस स्टेशन में कर आये उसके कुछ देर बाद व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी से झूट का ज्ञान की गंगा बहनी शुरू होती है और गुंडे मवालियों की एक फ़ौज बाहर निकल कर चुन चुन कर दुकानों को आग लगा देती है वे सभी दुकाने मुस्लिमो की थी बाद में उस भीड़ के चले जाने के बाद पड़ोसी दूकानदार जलती हुई दुकानों की आग को बुझाते है और वे सब हिन्दू थे अब यहाँ सवाल ये है की जिन लोगो ने आग लगाया वो कौन थे जिनकी दुकाने जली वो मुस्लिम और जिन्होंने आग बुझाया वो हिन्दू तो आग लगाने वाले हाँथ कौन से थे मैं इन्हे स्वंघोषित हिन्दू कहता ठीक उसी तरह से जैसे मैं उन आतंकवादियों को स्वंघोषित मुस्लिम कहता जो सर पे टोपी लगा कर दाढ़ी बढ़ा कर मासूमों की हत्या कर देते है। 

अब आते है उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश में एक विधायक और उसका भाई मिलकर एक लड़की का रेप करते है मैं आपको ये नहीं बताऊंगा की विधायक किस पार्टी से है या उसका नाम क्या है लेकिन मैं आपको यह जरूर बताऊंगा की रेप करने वाले खुद को किस धर्म का मानते है और जिस लड़की का रेप हुआ वो किस धर्म से आती है और वो भीड़ जिसने उस लड़की के ऊपर हमला किया उस रेपिस्ट नेता और उसके भाई को बचाने के लिए रेप हो गया लड़की और उसके पिता पुलिस स्टेशन गए इस उम्मीद में की रिपोर्ट करेंगे पर पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं करती उल्टा रेपिस्ट नेता का रेपिस्ट भाई पीड़िता के बाप को उठा ले जाता है उसे बुरी तरह मार कर अधमरा छोड़ देता है थोड़ी देर बाद पुलिस आती है और उस लड़की के पिता को उठा कर जेल में दाल देती है जहा पिता की मौत हो जाती है पुलिस मरे हुए पिता के अंगूठे का निशान लेते है बहुत सारे दस्तावेजों पर फिर उस नेता के के समर्थक उस लड़की पर हमला कर देते है जैसे तैसे वह लड़की अपनी जान बचा कर वहा से भाग जाती है अब सबसे छुपते छुपाते फिर रही है न जाने कब फिर कोई उसकी लाचारी का फायदा उठा ले। 
इस पुरे घटना क्रम में नेता भी हिन्दू लड़की भी हिन्दू लड़की का बाप भी हिन्दू मरने वाला भी हिन्दू मारने वाला भी हिन्दू रेप करने वाला भी हिन्दू जिसका रेप हुआ वो भी हिन्दू और फिर उस नेता के लिए एक और सेना भीड़ बनकर सामने  जाती है। 

अब चलते है जम्मू कश्मीर आठ साल की आसिफा को उसका पड़ोसी उसे गिडनॅपे करता है उसे मंदिर में कैद करता है उस छोटी सी बच्ची को हाई डोज़ बेहोशी की दवा देकर मंदिर में कैद करता है उसका सामूहिक बलात्कार करने से पहले मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है फिर उस बच्ची के जिस्म से सब मिलकर एक एक करके गोस्त का टुकड़ा नोचने लगते है सब मिलकर उसका बलात्कार करते है उस लड़की को पत्थरों से कुचल देने के बाद उनमे से कुछ उस बच्ची के मर जाने के बाद भी उसका बलात्कार करते है। लड़की का पिता अपने बच्ची के लाश को उसके क्षत विक्षत शरीर को अपने हाँथों में उठाये हुए है पुलिस आती है ताकि रिपोर्ट दर्ज हो सके और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही हो सके मगर होता क्या फिर से एक गुंडे मवालियों की फलाना धर्म सेना आती है और पुलिस से धक्का मुक्की करती है जय श्री राम का नारा लगाती है हाँथों में झंडे लिए भारत माता की जय बोलती है और लड़की के पिता को देशद्रोही और पाकिस्तानी बोल कर उसके साथ धक्का मुक्की करते है पुलिस बिना रिपोर्ट दर्ज किये लौट जाती है दो नेता है आते है और उस फलाना धर्म सेना की वाह वाही करते है और उनका मनोबल बढ़ा कर चले जाते है।  अब आप मुझे बताइये इनमे कौन सही है और कौन गलत हिंदुस्तान में दो तरह के राम का वास है इस वक़्त एक वो राम जो हम सबके दिलों में वास करता है वो राम हिंदुस्तान के कोने कोने में वास करता है और एक राम ऐसा है जो इनके जबानो पर तो है पर इनके दिलों में नहीं है हम सबका राम अन्याय करने से रोकता है और इन गुंडे मवालियों का राम अन्याय करने के लिए कहता है और जुल्म करने वालो को बचाने के लिए प्रेरित करता है ठीक इसी तरह दुनिया में सभी धर्मो का प्रति रूप जन्म ले रहा है एक वो इस्लाम है जो कहता है किसी एक मासूम का खून करना पूरी इंसानियत का खून करने के बराबर है और एक झूठा और फरेबी लोगो का इस्लाम है जो इस्लाम के नाम पर जिहाद के नाम पर मासूम लोगो का क़त्ल कर देते है इसी तरह बौद्ध धर्म भी दो है एक वो है जो कहता है की किसी जिव की हत्या मत करो और एक वो है जो कहता है की मुसलमानो को मार डालो आज पूरी दुनियां में हर धर्म का एक बुरा पक्ष तैयार हो रहा है इसे तैयार करने वाले हम ही लोग है न की कोई और तो फिर बताइये मुझे क्या मेरा यह कहना उचित नहीं की राम का नाम जपने वाला राम भक्त नहीं होता ठीक उसी तरह कलमा पढ़ने वाला हर शख्स मुस्लमान नहीं होता भारत माता की जय कहने वाला हर शख्स देश भक्त नहीं हो सकता ठीक उसी तरह वन्दे मातरम न कहने वाला देश का गद्दार नहीं हो सकता।

मैं हमेशा एक बात कहता राष्ट्रवाद किसी भी मुल्क को बेहतर बनाने की क्षमता रखता है वही अंधराष्ट्रवाद किसी भी ताक़तवर मुल्क को धरासाई करने की क्षमता रखता है ठीक इसी तरह सच्चा धर्म हमे बुराई और झूट के मार्ग से बचाता है वही अन्धविश्वास हमे अज्ञानता के गर्त में धकेल देता है जहा सिर्फ अँधेरा है जहा कुछ भी नहीं आता ये जो गुंडे और मवालियों की टोली है न ये भी धर्म से कोसो दूर है और अधर्म के गर्त में जा पहुंचे है जहा उन्हें न तो सत्य दीखता है न सुनाई देता है बस रह जाता है तो उनके अंदर का अन्धविश्वास। 

नोट :- इस लेख का मकसद किसी भी सच्चे आस्थावादी व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुंचना नहीं है इसका मकसद सिर्फ एक है की लोगो को सत्य दिखाया जाये ताकि वह झूठे और मक्कार लोगो के जाल में ना फंसे धर्म के नाम पर क्योकि वो धर्म नहीं अधर्म है वहा सत्य की प्राप्ति नहीं असत्य की गंगा का वास होता है ऐसे पाखंडी लोगो से बच कर रहे और अपने लोगो को भी इन लोगो से दूर ही रहने की सलाह से दे व्हाट्सप्प पे बांटे गए कचरे को सत्य मान कर ग्रहण करने और उसे दुसरो तक पहुंचने से पहले उसका सोर्स पता करे यह भी पता करे की इसके तथ्य सही है या नहीं। 

Wednesday, 14 March 2018

हमसफ़र | Humsafar Part-8

March 14, 2018 0 Comments

हम पुलिस स्टेशन पहुँचे और वहा काफी देर तक मुझ से पूछ ताक्ष किया गया उन्होंने मेरा पूरा बयान रिकॉर्ड किया फिर हम वहाँ से निकल कर वापस शबनम के घर गए कुछ वक़्त वहा रुकने के बाद मैं जाने लगा तो शबनम की अम्मी ने रोका ! तुम जाओगे कैसे ? जी ऑटो से , रुको मैं ड्राइवर से कह देती हूँ वो तुम्हे छोड़ आएगा ! जी सुक्रिया पर मैं चले जाऊँगा , नहीं बेटा तुम हमारे लिए इतने दूर से यहाँ तक आये हमारी बच्ची की मदद कर रहे हो हम तुम्हारे लिए इतना भी नहीं कर सकते ! जी ये तो बस मेरा फ़र्ज़ था मेरी जगह कोई और होता तो वह भी वही करता जो मैं कर रहा हूँ , शायद ? खैर मैं तुम्हारी एक नहीं सुनने वाली मैं गफ्फूर से कह देती हूँ वो तुम्हे छोड़ देगा ! ठीक है जैसा आप बेहतर समझे , मैं बाहर निकलने लगा तो फिर से उसकी अम्मी ने रोका अच्छा बेटा रात का खाना तुम हम लोगो के साथ ही खाना मैं गफ्फूर को भेज दूंगी वो तुम्हे लाने के लिए चला जायेगा ! जी इसकी क्या जरुरत थी खामखा आप जहमत उठा रही है मैं होटल में खा लूंगा , अरे बेटा जहमत कैसी तुम जब तक यहाँ हो हमारे मेहमान हो और महमानो का ख्याल रखना तो फ़र्ज़ है हमारा ! जी ठीक है आप जैसा बेहतर समझे चलता हूँ अस्सलाम वालेकुम - वालेकुम अस्सलाम !

मैं कार में बैठ गया गाड़ी चलने लगी और मैंने खिड़की से ऊपर की तरफ देखा तो दोनों ऊपर खड़ी हुई थी मैं बस हल्का सा मुस्कुराया ! रात हुई ड्राइवर के साथ मैं फिर शेख साहब के घर गया वहा सब मेरा इंतज़ार कर रहे थे ! देरी के लिए माफ़ी चाहता हूँ असल में रास्ते में ट्रैफिक जाम था , ये दिल्ली है बेटा ये सब आम बात है चलो तुम आ तो गए बेटी शबनम जाओ इसे हाँथ धुलवा दो खाने के लिए , जी अम्मी ! आईये , हाँथ धोने के बाद सब खाना खाने लगे काफी सारी बाते भी हुई सवालों और जवाबों का दौर चलता रहा खाने के बाद काफी बाते हुई मेरे और शेख शाहब के बिच असल में वो चाहते थे की मैं अदालत के कुछ तौर तरीको और सवालों और जवाबों को थोड़ा समझ लूँ उन्होंने साफ़ कह दिया की तुमने जो देखा वह तो तुम बता चुके हो लेकिन जब अदालत में होंगे तो तुम्हारी बात तभी मायने रखेगी जब तुम हर सवाल का जवाब सवाल को समझ कर बेहतर तरीके से दो मगर याद रहे इन सब से घबरा कर तुम कुछ उल्टा सीधा मत कह देना अगर तुम्हे सवाल समझ न आये तो चुप ही रहना ! मैं काफी देर तक उनकी हर एक बात सुनता रहा !

अच्छा जी अब मैं चलता हूँ काफी देर हो गयी है , ठीक है बेटा जाओ , अगर आप बुरा न माने तो क्या मैं संगीता से मिल सकता हूँ बस ज्यादा कुछ नहीं गुड नाईट कह देता , हाँ क्यों नहीं वो इस वक़्त छत पे होगी जाओ मिल लो -  सुक्रिया ! मैं ऊपर गया तो देखा संगीता रो रही थी मैं थोड़ा रुका और खांसा उसने तुरंत अपने आँसू पोछ लिए और खड़ी हो गयी ! अरे आप कब आये बस अभी थोड़ी देर पहले ही आप रो रही है ? नहीं तो , मुझसे झूट मत बोलिये आपकी आँखे बता रही है सब कुछ ! अरे नहीं वो तो मेरे आँखों में कचरा चला गया था तो उसी की वजह से कुछ आँसूं निकल आये सच सच बताइये क्यों रो रही थी आप आपने मुझे अपना दोस्त बनाया अब अगर आप मुझसे कोई बात छुपाएँगी तो मुझे लगेगा की आप सिर्फ मुझे दोस्त कहती है मानती नहीं है ! ऐसा नहीं है अफ़ज़ल , अगर ऐसा नहीं तो फिर बता दीजिये मुझे कम से कम आपका कुछ मन ही हल्का हो जाये बस कुछ अपने लोग याद आ रहे थे कितनी अजीब बात है न आज मेरे अपनों को ही मुझ पर भरोशा नहीं की मैं सच बोल रही हूँ और एक अंकल आंटी है जब उन्हें पता चला तो उन्होंने मुझे सपोर्ट किया अजीब है न कभी कभी खून के रिश्ते पराये से हो जाते है और कभी मुँह बोले रिश्ते खून के रिस्तों से भी ख़ास हो जाते है ! ये तो लोगो पर निर्भर करता है संगीता की वो अपने रिस्तों को कितनी अच्छी तरह से निभाते है और एक दूसरे को समझते है खैर तुम दुखी मत हो एक बार तुम ये कॅश जीत जाओ फिर सब तुम्हे अपना लेंगे ! पता नहीं शायद मेरे अपने मुझे अपना ले मगर क्या ये समाज और उसके लोग मुझे अपनायेंगे वैसे ही जैसे मैं पहले थी ! 

समाज भी तुम्हे आज नहीं तो कल अपना ही लेगा लेकिन किसी के भी तुम्हे अपनाने से पहले तुम्हे खुद अपने आप को अपनाना होगा अगर तुम खुद को नहीं अपना पाई फिर चाहे पूरी दुनिया तुम्हे अपना ले फिर भी तुम खुश नहीं रह सकती इसी लिए पहले खुद को अपनाओ ! तुम्हे ये अच्छी तरह से पता है की जो कुछ हुआ उसमे तुम्हारी गलती नहीं थी तुमने मना किया था उसे पर वो न रुका तुम्हारे इक्षा के विरुद्ध वह सब कुछ हुआ तो फिर बताओ मुझे किस आधार पर तुम अपने आप को दोषी ठहराओगी ! याद रहे संगीता तुम अकेली नहीं हो हम सब तुम्हारे साथ है मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा तुम हमारे हार मानने से पहले हार मत मानना देखो समाज तो पहले ही तुम्हे हारा हुआ समझता है तो क्यों न तुम ऐसे लड़ो अपने हक़ के लिए की एक मिशाल क़ायम हो जाये ! शायद तुम सही कह रहे हो ? अगर मैं सही कह रहा हूँ तो चलो ये आँसूं पोछो और खबरदार जो तुम फिर किसी के सामने या अकेले में रोई ! उसने हाँ में सर हिलाते हुए सर निचे कर ली 

अरे इतना लेट हो गया मुझे अब चलना चाहिए अच्छा अब इजाजत दे मुझे काफी देर हो गयी है और कल कोर्ट भी तो जाना है ! ठीक है चलिए मैं आपको निचे तक छोड़ आती हूँ ! सब लोग मुझे गेट तक छोड़ने आये बस एक शबनम ही नहीं थी उनमे मैंने पूछा तो उसकी अम्मी ने कहा वो आज जल्दी सो गयी है बस इसी लिए ,  ठीक है अब मैं चलता हूँ सबको सलाम करके मैं गाडी में बैठ गया और सबको बाए कर ही रहा था की शबनम ऊपर अपने टेरिस पे कड़ी हुई दिखी मैंने उसे देखते हुए अदब से थोड़ा सर को झुका कर सलाम किया उसने भी वही से मुझे सलाम की और फिर गाड़ी चल पड़ी होटल की तरफ जहा मैं ठहरा हुआ था !

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कहानी आगे जारी है। .........

नोट :- अगर आपने हमसफ़र का सातवाँ भाग नहीं पढ़ा है तो इस लिंक पे क्लिक करें
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Md Danish Ansari

Tuesday, 13 March 2018

ज़िक्र | Mention

March 13, 2018 0 Comments

ये न समझना के अब हम तुमसे मोहब्बत नहीं करते 
बात ये है की हुनर आने लगा है इसे छुपाने का तुमसे 

कई रातों से सोये नहीं हम और काम कर रहे 
काम क्या ख़ाक कर रहे काम तमाम कर रहे 

आँखें लाल हो रही और पलके बोझल हो गयी 
नींद न आने की बीमारी हाय मुझे कैसे हो गयी 

रातों को करवट बदलते रहे आँखों को बंद किये हुए 
न जाने कब कैसे आँख लगी ही थी की सुबह हो गयी 

दिमाग थक चूका है शरीर टूट रहा है
फिर भी चल रहा हूँ समय की धारा में 

तुम ये भी सोचती होगी शायद के, मेरे लफ्ज़ो में तेरा ज़िक्र नहीं है
मगर तुम गौर से देखो तो हर लफ्ज़ और हर हर्फ़ एक तुम्ही से है 

तुम कभी न भूलना के कोई है कही इसी दुनिया में किसी जगह पे 
जो तुमसे मोहब्बत करता था करता है और हमेशा करता रहेगा 

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Md Danish Ansari

Saturday, 10 March 2018

मान लिया X = ?

March 10, 2018 0 Comments


जब आपने ये टाइटल पढ़ा होगा तो आपको अजीब लगा होगा, है न की भला ये कैसा टाइटल है X = ? , जी हाँ ये बहुत कमाल का टाइटल है इसी टाइटल से हम सबकी जिंदगी जुडी हुई है आपकी मेरी आपके आस पास सभी मौजूद लोगो की !
मेरा एक सवाल है दर्द और दुःख क्या है ?
आप में से बहुत से ये लोग कहेंगे की जो शारीरक चोट हो तो दर्द होता है जैसे की अगर कोई आपको मारे तो आपको दर्द होता है टांग टूट जाये दर्द होता है चोट लग जाये दर्द होता है ! जब भावनात्मक चोट हो तो दुःख सही कहा न मैंने , लेकिन अगर मैं आपसे यह कहूँ की इस दुनिया में दर्द तो होता है मगर दुःख नहीं होता तो क्या आप यकीं करेंगे ! जाहिर है बहुत से लोग कहेंगे भला ये कैसे हो सकता है की दुःख हो ही न, हमारा कोई अगर अपना मर जाये तो दुःख नहीं होगा क्या कोई बहुत प्यारा अगर हमसे बिछड़ जाये तो दुःख नहीं होगा क्या ?
आपका सवाल सही है और इसी तरह के सभी सवालों का जवाब हमारे आज के टाइटल में छुपा है ***मान लिया X = ?***
दुःख हमे दो चीजो के वजह से होता है (1) पोजीशन (2) रिलेशनशिप
पोजीशन क्या है ?
माँ बाप भाई बहन मालिक नौकर अमीर गरीब पत्नी पति बेटा बेटी स्टूडेंट एम्प्लोयी मेनेजर क्लर्क बॉस कलेक्टर जज प्रधानमंत्री वगेरा वगेरा वगेरा , क्यों यही है न पोजीशन !
रिलेशनशिप क्या है ?
किसी भी पोजीशन पे रहते हुए जब आप दुसरे किसी पोजीशन वाले से किसी तरह जो व्यवहार करते हो उस व्यवहार से जन्मे मन मस्तिस्क के उत्तर को हम रिलेशनशिप कहते है !
समझ में नहीं आया न मैं आपको बताता हूँ ! आप अभी क्या हो आप एक आदमी या औरत है ठीक है लेकिन जैसे ही आप माँ बनती हो या पिता बनते हो बेटी या बेटा बनते हो तो फिर आप एक पोजीशन पे हो ! अगर आप शराब पीते हो तो आप अपने माँ बाप को या अपनी बीवी और बच्चो को नाराज करते हो फिर वो कहते है की आपने उन्हें दुःख पहुचाया ऐसा करके ! मगर सवाल यह है की आपके शराब पिने से भला उन्हें दुःख कैसे हुआ आपने उन्हें तो नहीं पिलाया अब इसे ही कुछ ऐसा करो की अगर आप शराबी हो तो किसी दुसरे शराबी को शराब पिला दो अपने रुपये से वो भी उसे फ्री में बिना उससे कुछ लिए तब वह क्या कहता है या आपके साथ कैसे व्यवहार करता है जाहिर है वह आपके इस व्यवहार से खुश हो जायेगा ! पर ऐसा हुआ क्यों एक तरफ आपके घर के लोग जहा नाराज़ हुए वही दूसरी और एक शराबी खुश हो गया कैसे ! यहाँ भी वही दो वजह काम करती है एक तो पोजीशन और दूसरा रिलेशन शराबी होना एक पोजीशन है अपने उसे शराब पिलाया वो रिलेशन के तहत है !
असल में हमारी पूरी ज़िन्दगी इन्ही दो चीजों से पूरी तरह घिरी हुई है और हम यह भूल जाते है की हम इंसान है हम अपने खुद को भूल जाते है और पोजीशन और रिलेशन के बिच फंस जाते है !
आप खुद सोचिये पति क्या है या बॉय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड क्या है या बेटा या बेटी क्या है और इन सभी की वजह से आपका दुःख क्या है पिता = व्यवहार, पत्नी = व्यवहार, बेटी = व्यवहार, बेटा = व्यवहार, बॉय फ्रेंड = व्यवहार, गर्ल फ्रेंड = व्यवहार, ये सभी X = ? में ही है जहाँ X = पोजीशन है , वहीँ ? = रिलेशनशिप है !
जब कोई लड़की आपको छोड़ के जाती है तो आप कहते है की आप दुखी हो मगर क्या यह सच है आपको दुःख इसलिए है क्योकि आप अभी भी उसी पोजीशन पे बने हुए हो यानि की बॉयफ्रेंड और आप खुद को दुखी इस लिए महसूस करा रहे हो क्योकि आप अभी भी उसी रिलेशनशिप से उम्मीद लगाये हुए हो ! हमे यह नहीं भूलना चाहिए की पोजीशन आती है जाती है और उसी के मुताबिक हमारा रिलेशनशिप भी बदलता रहता है ! एक गरीब कहता है वह बहुत दुखी है अपने गरीबी से मगर एक मिडिल क्लास खुद को उससे तुलना करके खुश  हो जाता है वही जब वो मिडिल क्लास का व्यक्ति किसी अपने से ज्यादा रुपये कमाने वाले से खुद को तौलता है तो फिर दुखी हो जाता है ठीक एक गरीब की तरह तो फिर बताइए गरीब क्या है और अमीर क्या है पोजीशन ही तो है वास्तव में हम सब इंसान है यह कहते तो है मगर मानते नहीं है कबूल नहीं करते की हम एक इंसान है और ये पूरी दुनिया एक रंग मंच है जहा हम सभी अलग अलग करैक्टर प्ले कर रहे है लेकिन यह हम पर निर्भर करता है की हम वह करैक्टर प्ले करना चाहते है की नहीं साथ ही हमे यह भी समझना होगा हर व्यक्ति अलग है उसकी सोच अलग है उसका पोजीशन अलग है उसका रिलेशन अलग है आप उनसे किसी भी चीज की उम्मीद सिर्फ तब तक कर सकते है जब तक वो उस करैक्टर को प्ले करता है अगर नहीं करता तो आप उससे उम्मीद नहीं करनी चाहिए बल्कि मेरा तो यही कहना है की हमे किसी से किसी भी चीज की उम्मीद नहीं करनी चाहिए मगर क्या वाकई नहीं करनी चाहिए ! जब आप ये उम्मीद करना छोड़ देंगे उस दिन आप सही मायनो में हर बंधन से मुक्त हो कर आज़ाद हो जाओगे मगर हम सब को यह ज़िन्दगी जीना पसंद है मुझे भी अगर ऐसा है तो फिर मैं आपको यह सब क्यों बता रहा हूँ ! इसकी वजह यह है की आप किसी भी पोजीशन और रिलेशनशिप के चक्कर में इतना न खो जाये की खुद के वजूद को ही भुला बैठे याद रखिये आप एक मुख्तालीफ़ इंसान है आपके जैसा न तो कोई पहले था और न अब है और न कभी कोई होगा ! जब भी आपको बहुत ज्यादा दुःख हो तो मेरे इस फोर्मुले को याद जरुर करना X = ? और देखिएगा आपको दुःख महसूस ही नहीं होगा !
हम बस मान लेते है की ये मेरा पति है ये मेरा बेटा है ये मेरी पत्नी है ये मेरी बेटी है ये मेरा बॉय फ्रेंड है ये मेरी गर्ल फ्रेंड है वगेरा वगेरा तो अगली बार याद रखियेगा इस फोर्मुले को – मान लिया X ( पोजीशन ) = ? ( रिलेशनशिप, व्यवहार )

नोट :- इस लेख में शराब या किसी भी नशीले पदार्थ का जिक्र करने का मतलब यह नहीं है की मैं उसे अच्छा मानता हूँ या उसका समर्थन करता हूँ ! नशा करना सेहत के लिए हानिकारक है !

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Md Danish Ansari

Thursday, 8 March 2018

औरत | Women's | Happy Women Day

March 08, 2018 0 Comments

औरत ये शब्द सुनते ही आपके मन मस्तिष्क में किसका चेहरा उभर कर आता है शायद माँ का, कहते है माँ ही वो जात है जो अपनी औलाद से बगैर स्वार्थ के मोहब्बत करती है और कोई नहीं बाकि सभी रिस्तो में कुछ न कुछ स्वार्थ होता ही है ! अब इस बात या विचार में कितना सत्य है और कितना झूट मैं नहीं जानता मैं तो बस इतना जानता हूँ की मेरी माँ मेरी परवाह करती है ! हर वक़्त बस हमारे बारे में सोचती है हमारे लिए जीती है कभी कभी तो ऐसा लगता है की ये माँ का कोई अपना वजूद भी है की नहीं बेशक उसी ने बच्चो को इस दुनिया में लाया मगर उसकी ज़िन्दगी उन्ही बच्चों के इर्द गिर्द घूमती रहती है और उन्हें पता भी नहीं चलता की कब वो उम्र के एक छोर से दूसरे छोर पर आ खड़ी हुई है !

सुना है औरत को कोई नहीं जान सकता और न ही उसके मन की अथाह गहराई को कोई माप सकता है पर ऐसा क्यों है ! शायद इसकी वजह यह रही हो की हमने कभी औरतो को अपने घर में और बाहर ऐसा माहौल बना कर ही नहीं दिया जिसमे वो अपनी बाते खुल कर रख सके ! कभी कभी जब वो अपनी बात रखती भी है तो घर और समाज दोनों बवाल करने लगते है यह सिर्फ किसी एक घर की कहानी नहीं और न ही किसी एक मुल्क की बात है यह हर तरह के समाज में आप देख सकते है फिर चाहे वह समाज या मुल्क कितना ही तरक्की पसंद हो या फिर कितना ही पिछड़ा हुआ ! अक्सर महिलाओं के कपड़ो को लेकर लोग जज करते है कमैंट्स पास करते है फिर उन्ही महिलाओं पे सबसे ज्यादा पुरुष फ़िदा भी होते है भले ही वह सिर्फ जिस्मानी जरूरियात लिए ही हो ! इससे एक बात तो तय होती है की हर वह पुरुष जो महिलाओं के छोटे कपडे पर ऐतराज जताता है मगर वही पुरुष अक्सर छोटे कपडे पहनी हुई औरतो पर डोरे डालता है तो वह उस औरत को सिर्फ अपने बिस्तर तक ही लाना चाहता है न की उसे अपनी बीवी बनाना !

ऐसे पुरुष सही मायनो में ढोंगी है जो समाज और घर परिवार में शराफत का मुखौटा ओढ़े रहते है और मौका मिलने पर सबसे पहले कपड़े उतारने में आगे होते है ! विद्या बालन जी की डर्टी पिक्चर में एक लाइन उन्होंने कही थी जब औरत अपने कपड़े उतारती है न तो सबसे ज्यादा मज़ा शरीफों को ही आता है ! मैं बस इतना कहूँगा की अगर कोई पुरुष इस लेख को पढ़ रहा है तो एक बार वो आत्म मथन जरूर करें की जिस तरह वो दुसरो की माँ और बहनों के साथ हमबिस्तरी होने को बेताब है तो क्या वो इस बात को भी तवज्जो देते हुए प्यार से क़बूल करेंगे की कोई और मर्द उनकी माँ बहन के साथ हमबिस्तरी हो ! यहाँ एक बात औरतों के लिए भी है जब आप अपना तन मन किसी को सौपने जा रही हो तो उससे पहले सामने वाले से ये जरूर पूछ लीजियेगा की जिस तरह मैं तुमसे मोहब्बत करती हूँ और तुम्हे अपना सब कुछ देने जा रही हूँ तो क्या तुम इस बात को स्वीकार करते हो की कल को अगर तुम्हारी बहन भी किसी को अपना सब कुछ सौपे अपनी मर्जी से तो तुम्हे उस पर कोई ऐतराज नहीं होगा ! अगर वह इस बात पे गुस्सा करें और आप पर चिल्लाये तो फिर अब आपकी मर्जी है की इसके बावजुद भी अगर आप उसे अपना सब कुछ सौंपना चाहती हो तो सौंप सकती हो ! लेकिन जहाँ तक मैं देख रहा वहा सिर्फ औरत की हार हुई है और हर उस पुरुष की जीत हुई जो औरत को अपनी निजी सम्पत्ति समझता है और सिर्फ एक सम्भोग मात्र वस्तु जो हाड़ मास से ज्यादा कुछ नहीं ! जिसमे न तो आत्मा है न कोई सोच न कोई भावना और न ही आत्म सम्मान वाली कोई और बात और हाँ प्लीज दुबारा फिर कभी औरतों के हक़ और उनकी बाते मत करियेगा क्योकि आप इस लायक नहीं रही क्योकि आप खुद औरत की हमदर्द नहीं बल्कि उसकी खुली दुश्मन है !

मेरे मुस्लिम भाइयों से सिर्फ इतना कहना चाहूँगा की अपने घर की औरतों और बाहर की औरतों पर पर्दा करने का पैगाम देने से पहले यह जरूर याद रखना औरतों को परदे के हुक्म से पहले खुदा ने तुम्हे अपनी नज़रों पर पर्दा करने का हुक्म दिया है ! मगर अफ़सोस मर्दों ने अपने नज़रों से पर्दा गिरा दिया और औरतों से इस बात की उम्मीद कर रहे है की वो पर्दा करें वाह क्या दोगलापन है खुद के चेहरे में कालिख लगी है और दूसरों को आइना दिखाते चल रहे है ! तुम अपनी आँखों पर पर्दा करों अपनी बहन से भी जब मीलों तो अपनी नज़रें नीची रखों पहले खुद का किरदार ऐसा बनाओं फिर अपने घर की औरतों से बाकि चीजों की उम्मीद करना अगर वो करना चाहे तो ठीक अगर न करना चाहे तो अल्लाह के हवाले क्योकि तुम्हारा अमाल और अमल तुम्हारे साथ और उनका उनके साथ ! मैं यहाँ किसी और धर्म के धार्मिक बातों का इस लिए उल्लेख नहीं कर रहा क्योकि मुझे नहीं लगता की यह सही होगा कही अगर भूल हो गयी तो खामखा का बवाल कौन अपने सर पे ले लेकिन इतना तो कह ही सकता हूँ की अगर औरत को देवी का स्वरुप मानते हो तो फिर उनसे अच्छा व्यवहार भी कीजिये किसी भूखे भेड़िये की तरह लार टपकाना बंद कीजिये !

वो मर्द जो औरत को नोच लेना चाहते है उसके जिस्म के हर एक गोस्त को नोचने के लिए लार टपका रहे नज़रों में हवस इतनी है की कुछ और नहीं देख पा रहे है तो उनसे सिर्फ इतना कहूँगा अगर दूसरों की बहन तुम्हे नज़र आ रही है तो दूसरों को भी तुम्हारी माँ और बहने नज़र आ रही है अगर तुम हैवान बन सकते हो तो भूलना मत उन्हें भी अपने अंदर के शैतान को बाहर लाने में कुछ ख़ास वक़्त नहीं लगेगा मगर इन सब के बिच तो अदरक की तरह औरत ही है अब यह औरतों पर है की वह क्या होना चाहती है अदरक या सही मायनों में औरत , एक ऐसी औरत जो अपने हक़ की लड़ाई खुद लड़े न की किसी से मदद की उम्मीद मैं बैठे रहे की कोई आएगा और उनसे कहेगा मैं तुम्हारे साथ हूँ तुम लड़ो ! भाड़ में गयी दुनिया और दुनिया वालो की मदद अगर तुम खुद की मदद नहीं कर सकती तो ईश्वर भी तुम्हारी मदद नहीं कर सकता !


दुनिया भर की औरतों को समर्पित जो अपने अपने हक़ की लड़ाई लड़ रही है फिर चाहे वह छोटी लड़ाई हो या बड़ी उन्हें भी समर्पित जो खूब लड़ी और हार गयी मगर कोशिश जरूर की बिना कोशिश किये हार जाने से बेहतर है कोशिश करते हुए शिकस्त हो जाना !


नोट :- अगर आप भी अपनी कहानी या कोई लेख या कविता गीत हमारे साथ शेयर करना चाहती/चाहते है तो आप मुझे अपना खुद का लिखा हुआ हमे  md.ansari.da@gmail.com  पर मेल करें अगर आप चाहती / चाहते है की आपकी पहचान गोपनीय रखी जाएँ तो आपकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी ! आपका दोस्त आपका भाई मोहम्मद दानिश अंसारी !
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Md Danish Ansari

Tuesday, 6 March 2018

हमसफ़र | Humsafar Part-7

March 06, 2018 0 Comments

अगली सुबह मैं दिल्ली के लिए रवाना हो गया मैंने एक होटल में कमरा बुक किया फ्रेश हुआ और संगीता को कॉल किया ! हाँ अफ़ज़ल जी कैसे है आप इतनी सुबह कैसे कॉल कर दिया आपने ? मैं दिल्ली में हूँ ! क्या आप मजाक कर रहे है , है न! जी नहीं मैं वाकई दिल्ली में हूँ और महाराजा पैलेस में ठहरा हूँ !  अब आप मुझे बताइये की मुझे आगे क्या करना है ? आप वही रुकिए मैं खुद आपके पास आती हूँ ! मैं तब तक नहा धो कर फ्रेश हो गया करीब ग्यारह पैतालीस पे डोर बेल बजी मैंने दरवाजा खोला तो एक लड़की सामने खड़ी थी , जी कहिये ? तभी साइड से वो सामने आयी ! ये मेरी नज़रो का धोखा था या फिर मैं इतने सालो बाद संगीता को देख रहा था उसका असर वह पहले से बहुत ज्यादा बदल चुकी थी और काफी खूबसूरत भी लग रही थी ! गुड मॉर्निंग , उसने कहा ! मैंने रिप्लाई किया , कैसी है आप ? अब सारी बाते यही दरवाजे पर करोगे या हमें अंदर भी आने के लिए कहोगे ? ओह सॉरी , प्लीज आईये न अंदर बैठ कर बाते करते है ! वो अंदर दोनों अंदर आयी , अफ़ज़ल ये है मेरी सहेली शबनम ! सलाम वालेकुम , वालेकुम सलाम प्लीज् आप लोग बैठिये न।   क्या लेंगी आप दोनों कॉफी या चाय ? जी सुक्रिया हम घर पे पी लिए है ! 
तो अब बताइये मुझे क्या करना होगा ? अगर आप तैयार हो तो आप हमारे साथ चलिए वकील से पहले आपको मिलाना वो जो भी पूछे आप उसका सीधा सीधा जवाब दीजियेगा उसके बाद ही वही बताएँगे की आगे हमे अब क्या करना है ! जी ठीक है। 
हम होटल से निकल गए बहार संगीता की सहेली गाड़ी में पीछे बैठी थी ! ये कार किसकी है ? मेरी सहेली की आइये ! मैं आगे की सीट पर बैठ गया और संगीता और उसकी सहेली पीछे बैठ गयी , शबनम ने कहा - गफूर भाई घर चलिए ? आपने तो कहा था की वकील से मिलने जा रहे है ! जी हाँ वही तो जा रहे है मेरे अब्बा वकील है और वही संगीता का केस लड़ रहे है तो अब हम चले ! जी ! मैं शबनम के घर गया वह उन्होंने मुझे शबनम के अब्बा से मिलवाया उन्होंने तो सलाम और दुआ के बात पुरे सवालों का लाइन लगा दिया उनके सवालो का जवाब देते देते मुझे जोरो की भूख लग गयी नास्ता भी नहीं किया था वैसे भी दोपहर के खाने का वक़्त तो हो ही गया था ! जब उनके सवालों और जवाबों का दौर ख़त्म हुआ तो फिर उन्होंने मुझे खाने पे दावत दिया वैसे भी मैं अंदर से बहुत ज्यादा भूखा था मगर क्या करता तहज़ीब नाम की भी कोई चीज़ होती है पहले तो मैंने मना कर दिया फिर उन्होंने मुझे दावत दिया तो फिर मैं मान गया हम खाने के टेबल पे थे खाना लगा और सब खाना शुरू कर दिए और मैं उन्हें देखता रहा ! वो इसलिए क्योकि वो छुरी और काँटों और चमचों से खा रहे थे जो मुझे पसंद नहीं मेरा भूख भी नहीं मिटती !
मुझे खाता न देख कर संगीता ने कहा आप कुछ खा क्यों नहीं रहे है कोई दिक्कत है क्या ? जी नहीं ! फिर मैंने न आओ देखा न ताओ सीधा अपने आस्तीन मोड़े और खाना शुरू कर दिया मुझे हाँथों से खाता देख शबनम जी के अब्बा मुस्कुरा बैठे और उनकी अम्मी रसीदा खातून भी मैं पूरा ध्यान खाने में लगाया और बस मजे से खाता रहा बाद में मुझे बहुत बुरा भी लगा और हंसी भी आयी बुरा इसलिए की वो मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे और हंसी इसलिए की मैं खुद पे ही हँसे जा रहा था ! खाना खा लेने के बाद शेख साहब ने कहा की हम कुछ देर के बाद पुलिस स्टेशन जायेंगे वह भी आपको वही बाते बतानी है जो तुमने मुझे बताई है उनका रवैया कड़क भी हो सकता है और नरम भी तुम बोल तो पाओगे न वहाँ वैसे हमारे पास तुम्हारे अपने शहर के पुलिस वालो को दिए बयां की कॉपी तो है लेकिन यहाँ की पुलिस भी तुम्हारा बयां लेगी तो तैयार रहिएगा ? जी बेशक !


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कहानी आगे जारी है। .....

नोट :- अगर आपने हमसफ़र का छटवाँ भाग नहीं पढ़ा है तो इस लिंक पर क्लिक करें 


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Md Danish Ansari

Monday, 5 March 2018

मजदुर | Workers

March 05, 2018 0 Comments

इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में अब मैं खुद को अकेला महसूस करने लगा हूँ ! हर वक़्त मेरे आस पास लोगो का हुजूम होता है मगर फिर भी अकेला महसूस करता हूँ हर रोज एक ही काम घर से दफ्तर और दफ्तर से घर बस इन्ही दो जगहों में मेरी ज़िन्दगी घूंट कर रह गयी है और बड़ी तेजी से वृद्धावस्था की तरफ जा रही है ! मगर मेरा शरीर जवान है मगर उसमे वो जोश नहीं बचा जो युवावस्था में होता है मन जो चंगा होना चाहिए वो उदास है !
पुरानी ज़िन्दगी बहुत याद आती है जेब में रुपये नहीं थे मगर मन खुश था हर समय उमंग से भरा रहता मगर अब वो सारे उमंग कही खो गए है या फिर दब के रह गया है ! ऑफिस का माहौल भी कोई खुशनुमा माहौल नहीं है हर वक़्त बस एक ही शब्द हर किसी के दिमाग और ज़बान पर होती है वो है टारगेट ! दिन गुजरते है हफ्ते में  हफ्ते गुजरते हुए महीने में बदल जाते है सब कुछ बदल रहा है अगर नहीं बदलता तो वो है ऑफिस और इस मन की वो अवस्था जिसमे सबका हर्ष और उल्लास दफ़्न हो चूका है ! छोटे शहरों में रोजगार कम होता है और जो होता है उसमे रोजगार देने वाला मालिक इतनी सैलरी भी नहीं देता की उससे किसी का घर अच्छे से चल सके और उसमे भी मालिक यह पूरी कोशिश करते है की उसी कम सैलरी में हम कैसे मजदूरों की मेहनत और हुनर का एक एक बून्द निचोड़ ले फिर चाहे मजदूर या एम्प्लोयी अवसाद से ग्रस्त हो जाये या फिर उसकी सेहत बिगड़ जाये !

मैं अच्छी तरह जानता हूँ की जब आप मेरे इस लेख को पढ़ रहे होंगे तो यह कह रहे या सोच रहे होंगे की अगर काम करने वाली जगह में इतनी ही प्रॉब्लम है तो फिर काम छोड़ क्यों नहीं देते ! यकीं मानिये आप इस लेख को पढ़ने के बाद शायद एक बार या दो बार काम छोड़ने की बात कहे मगर सच यह है की मुझ जैसे लाखो नहीं बल्कि करोड़ों मजदुर और एम्प्लोयी है जिनके दिमाग में हर रोज और दिन भर में कई बार ये ख्याल आता है मगर बेरोजगारी इतनी ज्यादा है की कोई भी इस ख्याल पे अमल करने से डरता है ! मेरे देखते ही देखते मेरे बहुत सारे ऑफिस के एम्प्लोयी काम छोड़ दिए और जब उन्हें कोई काम न मिला तो फिर उसी ऑफिस को ज्वाइन कर लिए ! ऐसा जब होता है तो मालिकों का साहस बढ़ जाता है अपने एम्प्लोयी के शोषण को लेकर उसका खुराफाती दिमाग हर समय नए नए तरीके इजात करता  है मजदूरों की पूरी क्षमता को निचोड़ लेने के लिए , मैं आपको इन मालिकों के खुराफाती दिमाग की एक उपज के बारे में बताता हूँ -

आप मुझे बताइये - मान लीजिये आप किसी वजह से महीने के कई दिन ऑफिस नहीं गए क्योकि आप बीमार थे या फिर कोई फॅमिली इशू की वजह से तो जाहिर सी बात है ऐसी स्थिति में आपकी सैलरी कटेगी और यह सही भी है अब आप वापस काम पे आते है और पूरा जी तोड़ मेहनत करते है अपने टारगेट को पूरा करने के लिए और आप पूरा कर भी लेते है ! मगर अब जब बात इंसेंटिव यानि प्रोत्साहन राशि की आती है तो फिर से आपका मालिक आपके इंसेंटिव काट लेता है उतना जितने दिन आपने छुट्टी ली इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की आप छुट्टी के लिए आवेदन दे कर गए थे या फिर बिना बताये गए थे बस आप छुट्टी पे थे इस लिए आपका इंसेंटिव यानि प्रोत्साहन राशि काटी जाती है ! 

अब आप मुझे बताइये क्या यह किसी भी तरीके से न्याय संगत है की एक एम्प्लोयी जो छुट्टी पे था आपने उसकी सैलरी भी काटी और फिर उसका इंसेंटिव भी काटा - इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की वह मजदुर या एम्प्लोयी छुट्टी बता कर किया था या बिना बताये !

मैं आपसे पूछता हूँ की दुनियाँ भर में जितने भी मजदुर है जितने भी ऑफिस वर्कर है उन्हें इंसेंटिव अटेंडेंस की वजह से मिलती है या उनके टारगेट अचीवमेंट की वजह से , जाहिर है उनके टारगेट अचीवमेंट की वजह से तो फिर छुट्टी करने पर जब मालिक सैलरी से रुपये काट लेता है तो क्या उसे यह अधिकार है की वह उनका इंसेंटिव भी काटे , जाहिर है नहीं ! अब आप में से बहुत से लोग यह सोच रहे होंगे की अगर ऐसा अन्याय हो रहा है तो एम्प्लोयी कोर्ट क्यों नहीं जाता , मगर इसमें भी एम्प्लोयी की ही हार है अगर वह कोर्ट जायेगा तो उसका बहुत सा समय वही गुजर जायेगा वो काम कब करेगा और कमाएगा कैसे क्योकि तब तक तो उसकी नौकरी भी जा चुकी होगी !

मजदुर जल्दी से हड़ताल नहीं करना चाहते क्योकि उन्हें इस बात का अंदाज़ा है की अन्याय के खिलाफ लड़ने वाली सारी बाते और सारी हीरोपंती सिर्फ किताबों में अच्छी लगती है हकीकत की दुनियाँ में नहीं मजदुर अगर एक हो भी जाये तो भी ये मील मालिक सरकार से हाँथ मिला कर इन मजदूरों के हाँथ पैर तोड़वाने का इन्हे बुरी तरह कुचल देने का पूरी कोशिश करते है और इसी बिच मजदूरों और एम्प्लोयी की माली हालत बिगड़ चुकी होती है जो उसे घुटने टेकने पर मजबूर करती है !

जब मजदुर विरोध प्रदर्शन या हड़ताल करता है तो वह न तो पुलिस की मार से टूटता है न ही मील मालिकों के अलग अलग हथकंडो से वह टूटता है तो खुद के अंदर बन रहे उस हालात से जो उसके परिवार को भूखा सोने पर मजबूर कर देते है ! दुनियाँ भर में लोग कुचले जा रहे है और वो पढ़े लिखे लोग जिन्हे यह दायित्व सौंपा गया था की वह हमारे अधिकारों की रक्षा करेंगे वो मालिकों के साथ मिलकर जल्लाद हो गए , सिर्फ कहने और दिखने के लिए ये राम होते है मगर हकीकत में ये रावण से ज्यादा आगे है ! वरना आप खुद सोचिये की जिस नोटबंदी में पुरे मुल्क के लोगो की आय में कमी हुई वही सिर्फ एक प्रतिशत पूंजीपतियों की आय में छब्बीस से सत्ताईस प्रतिशत की वृद्धि हुई क्या आप बता सकते है यह कैसे हुआ होगा ?

यह सिर्फ एक छोटा सा सच्चा उदाहरण था आपके लिए। ........ और इन्ही सब के बिच मैं हर रोज की तरह हारा हुआ थका हुआ और मरा हुआ घर पहुँच जाता हूँ सिर्फ सोने के लिए क्योकि इतनी ताक़त नहीं होती शरीर में की किसी से बात भी की जाये और गलती से किसी ने बात करने की कोशिश की तो ऐसे झुँझला उठता हूँ जैसे पता नहीं कितनी बड़ी बात हो गयी हो !
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Md Danish Ansari

Wednesday, 21 February 2018

हमसफ़र - Humsafar Part-6

February 21, 2018 0 Comments

रात भर इस बारे में सोचता रहा की आखिर ये कैसे हो सकता है की जिस लड़के की सगाई हो चुकी हो वही अपनी मंगेतर का बलत्कार करे ? यह सवाल इस लिए नहीं था की मैं आइशा के किरदार पर शक कर रहा था बल्कि यह सवाल उस लड़के पे था जिसपे आइशा यानि संगीता आरोप लगा रही थी ! आप खुद ही जरा सोचिये अगर आपकी सगाई हो चुकी है और कुछ ही महीने बाद अगर आपकी शादी होने वाली है तो क्या आप कभी उस लड़की से बलत्कार करने के बारे में सोचेंगे ? 

मेरे नज़रिये से तो नहीं मगर मेरे इस बात की सहमति से संगीता के ऊपर उँगलियाँ उठेंगी इसी लिए मैंने सोचा की अपने मन में किसी के प्रति भी किसी तरह का विचार या सोच को जन्म देने से बेहतर है की उसके बारे में न सोचा जाये ! मगर लाख कोशिशों के बावजूद भी उन सभी विचारों को मैं रोकने में असमर्थ रहा रात भर बस करवटे बदलता रहा सुबह ऑफिस चला गया ! इसी तरह सप्ताह के चार दिन बीत चुके थे और रात के वक़्त मैं सोने की तैयारी कर ही रहा था की मेरे मोबाइल का रिंग बज उठा मैंने कॉल उठाया और - हेलो कौन ? इतनी जल्दी भूल गए मुझे मेरे लिए तो मुझे यह ऐसा लगता है जैसे ये अभी कल की ही बात हो ! माफ़ कीजियेगा मैंने आपको पहचाना नहीं क्या आप अपना नाम बतायेंगी ? आवाज़ भी भूल गए हो !

आगे कुछ भी कहने से पहले मैं रुका और सोचने लगा की ये कौन हो सकती है तभी मैं बोल पड़ा - तुम आइशा बोल रही हो न ? आइशा ??? आइशा कौन ? अरे मेरा मतलब था तुम संगीता बोल रही हो न ! जी हाँ ! चलो पहचान तो लिया आपने , अरे पहचानता कैसे नहीं ! बाते होती रही और फिर वो सारी बाते भी जो उसके साथ हुई और जो अभी हो रही थी ! संगीता जी अगर मैं आपसे कुछ पूछूँ तो क्या आप उसका सही और साफ़ सुथरे तरीके से जवाब देगी ? हाँ बिलकुल पूछिए ! संगीता जी ऐसा कैसे हो सकता है की जिस लड़के की सगाई हो चुकी हो और उसकी शादी होने वाली हो वह अपनी होने वाली पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार करेगा मुझे तो यकीं ही नहीं हो रहा ! मैं जानती हूँ की आपको यकीन नहीं हो रहा और यकीन मानिये ऐसा सोचने वाले सिर्फ आप अकेले नहीं है मेरे खुद के माँ बाप और रिस्तेदार भी इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे !

जब आपके अपने ही आप पर भरोशा न करें तो बताइये भला दूसरे लोग क्यों मेरी बातो पे यकीन करने लगे इसी लिए इसमें आपकी कोई गलती नहीं की आप ऐसा सोच रहे है ! मैं यह तो नहीं कहूँगी की मैं आपको यहाँ बुलाना नहीं चाहती अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए मगर मैं आपसे ये भी नहीं कहूँगी की आप यहाँ न आये अगर आप अपनी मर्जी से आते है तो मुझे अच्छा लगेगा की मेरे ज़िन्दगी और मौत के बिच आपने मुझे बचाया और एक नयी ज़िन्दगी दी और अब फिर दुबारा जब मैं मुसीबत में हूँ तो फिर से आपका मुझे साथ मिलेगा ! इसी तरह काफी देर तक बाते होती रही और रात गुजरती रही बातो के दरमियान ही मैंने यह निश्चय कर लिया की मैं वहा जरूर जाऊँगा अगर मेरे वहा होने से किसी को न्याय मिल सकता है तो मुझे जाना ही चाहिए ! अगली सुबह मैं दिल्ली के लिए निकल पड़ा। ...............

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कहानी आगे जारी है। ........

नोट :- अगर आपने हमसफ़र का पाँचवा भाग नहीं पढ़ा है तो इस लिंक पर क्लिक करें 

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Md Danish Ansari

Monday, 19 February 2018

हमसफ़र - Humsafar Part-5

February 19, 2018 0 Comments

करीब तीन साल हो चुके थे उसे यहाँ से गए हुए मेरी ज़िन्दगी पहले की तरह चल रही थी रोज सुबह ऑफिस जाना और शाम को लौट कर खुद खाना बना खा कर सो जाना एक ऐसी ज़िन्दगी जो बेहद आम सी थी नौकरी करने वाले लोगो के बिच खुद के लिए तो वक़्त ही नहीं मिलता कभी , की कभी खुद के बारे में सोच सकूँ ! इस ज़िन्दगी में सब कुछ परफेक्ट नहीं था सिवाए एक के वो था मेरा टाइम टेबल सही वक़्त पे उठना सही वक़्त पे सोना हर काम का एक टाइम बंधा हुआ था और इस टाइम टेबल में मैं ! सब कुछ था मेरे पास अच्छी नौकरी थी घर था बैंक में रुपये थे गाड़ी भी हर जरुरत का सामान मेरे पास था मगर फिर भी खुश नहीं था न अपने अपने आप से और न ही अपने काम और न ही अपनी इस ज़िन्दगी से, रविवार को घर पे अकेला होता तो टीवी देख लेता हॉलीवुड उसके सिवा कभी घूमने निकल जाता तो कुछ दोस्तों से मिल आता ! एक वही तो थे जो मेरा अकेलापन समझते है !

रविवार की रात को मेरे घर पर दस्तक हुई दरवाजा खोला तो इंस्पेक्टर साहब बाहर खड़े हुए थे ! अरे सर आप बताइये कैसे आना हुआ अचानक से यहाँ आने की वजह ? असल में ! अरे अंदर आइये न अंदर बैठ कर बाते करते है ! मैं इस बात से उस वक़्त पूरी तरह अनजान था की मैं किस तूफ़ान को अपने घर के अंदर ला रहा हूँ जो हमेशा के लिए अब मेरी ज़िन्दगी बदल के रख देगा और इन सभी बातो से अनजान मैं उन्हें अंदर ले आया ! क्या लेंगे सर कॉफ़ी या चाय ? अरे नहीं कुछ नहीं दरअसल मैं यहाँ कुछ काम से आया था !  काम से वो भी मुझसे कहिये ? तुम्हे वो लड़की याद संगीता है जिसे तुमने बचाया था ? जी हाँ क्या हुआ उसे वो ठीक तो है न ! नहीं ? मतलब उसे कुछ हुआ है क्या ? दरअसल उसकी खोई हुई याददास्त एक हफ्ते पहले ही वापस लौट आयी है और यही वजह है की मैं तुम्हारे पास आया हूँ मुझे दिल्ली कोर्ट से आर्डर आया है की हम तुम्हे वहा पेश करें ! मुझे पर क्यों ? तुम गवाह हो उस घटना के और तुम्हारी गवाही बेहद अहम् है कोर्ट के लिए ! मगर मामला क्या है ? 

उस घटना से कुछ महीने पहले उस लड़की की सगाई हुई थी और फिर वो लड़की हमे यहाँ मिली अधमरी हालत में अब जब लड़की की याददास्त लौट आयी है तो वह लड़के पे आरोप लगा रही है की उसने उसका बलत्कार किया था और मैं किसी को बता न दूँ इस बारे में इसलिए डर के मारे उसने उसे जान से मारने की पूरी कोशिश की मगर उसकी किश्मत अच्छी थी की वो बच गयी ! पर ऐसा कैसे हो सकता इंस्पेक्टर ? जब मैं उस लड़की को नदी से बाहर निकाल के लाया था तो उसकी के कपडे बिलकुल सही थे कही से फटे नहीं थे उसके जिस्म पे कुछ खरोंचे तो हम सबने देखा था मगर किसी ने भी इस बात पे कुछ कहा नहीं और फिर सबसे बड़ा सवाल तो ये भी है की यहाँ के डॉक्टर ने खुद आपसे कहा था की लड़की के साथ किसी तरह का सेक्सटुअल इंटरकोर्स नहीं हुआ फिर अचानक से यह सब कैसे ? यही तो सवाल है ? जिसका जवाब दिल्ली से यहाँ तक ढूंडा जा रहा है हमने डॉक्टर को हिरासत में ले लिया है और कोर्ट ने तुम्हे भी पेश करने को कहा है ! यानि आप मुझे गिरफ्तार करने आये है नहीं फिलहाल तो नहीं मैं तुम्हे कोर्ट के आर्डर देने आया हूँ अब देख लो तुम्हे अगर जाना है तो जाओ वरना मत जाओ पर एक बार अच्छे से जरूर सोच लेना क्योकि यहाँ किसी की ज़िन्दगी और इन्साफ का सवाल है और तुम उन सभी कड़ी में से एक कड़ी हो जिसके बगैर सवालो के जवाबों तक नहीं पहुंचा जा सकता ! मुझे कुछ वक़्त चाहिए इंस्पेक्टर सोचने के लिए उसके बाद ही मैं कुछ कह सकता हूँ ! ठीक है मैं अब चलता हूँ वैसे केस की अगली सुनवाई एक हफ्ते बाद है अब तुम सोच लो के तुम्हे जाना है या नहीं !

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कहानी आगे जारी है ...........

नोट :- अगर आपने हमसफ़र का चौथा भाग नहीं पढ़ा है तो इस लिंक पर क्लिक करें 
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Md Danish Ansari

Monday, 12 February 2018

हमसफ़र - Humsafar Part -4

February 12, 2018 0 Comments

अगली सुबह महिला आयोग के कुछ अधिकारी आये काफी सारी पूछताछ के वो उसे वहा से ले जाने लगे , मैं अपने बेड पर लेटा हुआ था लेटे लेटे ही पता नही मुझे क्या हुआ मैंने उसे पुकारा एक नाम - आयशा मैंने ये नाम जैसे ही लिया सब रुक गए और वो भी , क्या कहा तुमने ? जी मुझे लगा जब तक हमे इसके बारे में कुछ पता नही चलता तब तक के लिए क्यों न हम इसे किसी नाम से पुकारे तो मेरे जहन में बस ये नाम आया आयशा अच्छा है न ! सभी लोग मुझे देखने लगे तभी एक महिला अधिकारी सामने आयी और बोली बहुत खूबसूरत नाम सोचा तुमने वैसे भी कोई नाम तो रखना ही था जब तक हमे इसका असली नाम न पता चल जाये ! महिला अधिकारी मुड़ी और बोली आप में से किसी को ऐतराज तो नही इस नाम से सभी ने कहा नहीं , फिर वो जाने लगे दरवाजा बंद हो गया और वह मुड़ी और एक नज़र देख कर आगे बढ़ गयी !
इन सभी चीजों में सबसे बड़ी बात ये थी की जिस पुलिस का देश के हर कोने से संपर्क रहता है वो जब चाहे जहा चाहे जिसके बारे में जानना चाहते है जान लेते है लेकिन आज तीसरे दिन भी पुलिस को कोई सुचना मिली ही नहीं! हॉस्पिटल से मुझे तीसरे दिन डिस्चार्ज कर दिया गया मैं अपने घर चला गया अभी भी जख्म भरे नही थे पर अब मैं चल फिर ले रहा था ! शाम हुई तो मैं नींद से उठा और फ्रेश होकर अपने लिए चाय बनाने लगा तभी दरवाजे की घंटी बजी, कौन है ? मैं इंस्पेक्टर रणजीत , आ जाइये सर दरवाजा खुला हुआ है !
वो अंदर आये , कहा हो भाई तुम दिख नही रहे हो, इधर हूँ सर चाय बना आप पिएंगे क्यों नही मगर पहले किचन से बाहर आ कर ये तो देख लो हमारे साथ आया कौन है ? आपके साथ कौन हो सकता है सर आपके साथी ही होने है क्यूँ सही कहा न ? कुछ हद सही कहा पर मेरे साथ कांस्टेबल के अलावा भी कोई और है ? अच्छा रुकिए आ रहा हूँ !
जैसे ही बाहर गया हैरान रह गया देख कर आप शायद समझ ही गए होंगे की कौन हो सकता है मगर मैं हैरान इस लिए था क्योकि जिसे मैंने हॉस्पिटल में आखरी बार देखा था और जो अभी देख रहा था उसमे जमीन आसमान का अंतर था , बहुत ही खूबसूरत सफ़ेद रंग उस पर खिल रहा था , अरे आयशा तुम ! गलत इसका नाम आयशा नहीं है इसका नाम कुछ और है ! मतलब ? मतलब ये की हमे पता चल गया है की इसके बारे में सब कुछ इसका नाम इसके परिवार इसका घर सब कुछ ! अच्छा ये तो बहुत ही अच्छी खबर है सर कहा से है ये और क्या नाम है इनका ? इनका नाम है संगीता और ये दिल्ली से है और इनका परिवार वाले कल आकर इन्हे यहाँ से ले जायेंगे ! इनकी यह ख्वाहिश थी की यहाँ से जाने से पहले ये आप से मिलना चाहती थी इसी लिए हम इन्हे यहाँ लेकर आये !
पुलिस वाले और महिला आयोग के अधिकारी उसे मेरे यहाँ छोड़ कर चले गए ये कह कर की हम दस बजे आएंगे इन्हे लेने के लिए मैंने हाँ में सर हिला दिया ! मेरे अंदर जहा ख़ुशी थी की वह मुझसे मिलने आयी है वही इस बात का कही न कही गम भी था की अब उससे कभी मुलाकात नहीं होगी , खैर इन सब बातो की परवाह किये बगैर मैं तो बस उसकी खातिरदारी में लग गया उसने भी मेरा साथ दिया और खाना पकाने में आसानी हो गयी अजीब भी लगा की घर पर आये मेहमान से इस तरह से अपने काम में हाँथ बटवाना पर शायद यह उस वक़्त की परिस्थितियों के हिसाब से लाजमी था क्योकि मैं ठीक से कोई काम नहीं कर पा रहा था !

हमने कुछ ज्यादा बाते नहीं की यह जानते हुए भी की हम दुबारा शायद ही मिले बस कुछ बाते की भी तो काम की उसके अलावा कुछ भी नहीं ! खाना पीना हो गया और अब उसके जाने का वक़्त भी उसे लेने के लिए अधिकारी आ चुके थे मैं समझ ही नहीं पाया की मुझे कैसे रियेक्ट करना चाहिए खुश भी था और कही न कही गमगीन भी जताना नहीं चाह रहा था बस लेकिन छुपाये कहा छुपता है सच ! वो जाने लगी वो दरवाजे पर पहुँची ही थी की मैंने कहा रुकिए जरा आपकी एक अमानत मेरे पास है जिसे आपको लौटाना जरुरी है , मैं जल्दी जल्दी अपने कदम अपने रूम की तरफ बढ़ाने लगा और अपने ड्रा से उसका लॉकेट निकाल लाया जो मुझे उसे हॉस्पिटल के स्ट्रेचर पर लिटाते वक़्त उसके गले से टूट कर मेरे हाँथों में आ गया था ! 
अपना हाँथ आगे करो ! क्यों ? सवाल मत पूछो बस अपना हाँथ आगे करो ! वो अपना हाँथ आगे की और उसके हाँथ में वो लोकेट मैंने रख दिया जब उसने देखा तो बोली ये क्या है , ये तुम्हारा है तुम्हे हॉस्पिटल पहुचाने के बाद ये मेरे पास था जो अब तुम्हे लौटा रहा हूँ ! नहीं मैं इसे नहीं ले सकती , ले लो प्लीज और वैसे भी ये तुम्हारा है , बेशक हो सकता है की ये मेरी हो पर मैं चाहती हूँ की इसे तुम रखो अपने पास मेरी याद के तौर पर , क्या वाकई तुम ऐसा चाहती हो की मैं इसे रखूँ ? हाँ मैं चाहती हूँ की तुम इसे अपने पास रखो कम से कम जब भी तुम इसे देखोगे तो मैं याद रहूँगी !
ओके ठीक है मैं इसे रख लेता हूँ मगर मुझे भी तुम्हे कुछ देना है मैं अपने जेब से एक दूसरा लोकेट निकला जिसमे घडी लगी हुई थी ! मैंने इसे खुद बनाया है तुम्हारे लिए ये उतनी अच्छी तो नहीं बनी है पर मुझे अच्छा लगेगा अगर तुम इसे अपने पास रखो , क्या कह रहे हो तुम ये तो कितनी खुबसूरत बनी है शुक्रिया , शुक्रिया तुम्हारा भी और बस इतना कह कर वो चली गयी !

देखने वाले की आँखों में मेरा ही गीत था 
वो गीत जो हमने कभी उसे सुनाई भी न थी 

कहानी आगे जारी है ...........

नोट :- अगर आपने हमसफ़र का तीसरा भाग नहीं पढ़ा है तो इस लिंक पर क्लिक करें 
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Md Danish Ansari

Thursday, 8 February 2018

हमसफ़र - Humsafar Part -3

February 08, 2018 0 Comments

शाम को मैं हॉस्पिटल पहुँचा उस लड़की को देखने पर वो मुझे अपने बेड पर नही दिखी तो मैं रिसेप्शन पर गया और वहा पूछने पर पता चला की उसे तो आधे घंटे पहले ही डिस्चार्ज किया गया है ! उसे यहाँ लेने कौन आया था ? जी कोई नही तो फिर आपने उसे डिस्चार्ज क्यूँ किया आपने पुलिस को कॉल करके बताया की मरीज को आपने यहाँ से डिस्चार्ज किया है ? नही सर , वाह न पुलिस को खबर की न मुझे जब की मेरा नंबर भी मैंने यहाँ छोड़ रखा है ! मैं हॉस्पिटल से बाहर आया और जल्दी से पुलिस को कॉल किया उन्हें सारी बात बताई , मैं उसे ढूंढते हुए लाल चौक पे पहुँचा काफी देर तक ढूढ़ने के बाद भी वो मुझे दिखी नही ! मैं घर की तरफ लौट नही पा रहा था मुझे उसका ख्याल आता और मेरे कदम रुक जाते पुरे शहर में ढूंढते ढूंढते रात हो गयी इस पुरे बिच मैं पुलिस को कॉल करके हालात का जायजा लेता रहा मगर पुलिस के हाँथ भी वह अभी तक नही लगी थी ! मैं समझ नही पा रहा था की वह इतनी जल्दी इस शहर से गुम कैसे हो गयी क्या वो इसी शहर की थी अगर ऐसा होता तो अब तक तो उसके परिवार वाले आ कर उसे ले जा चुके होते मगर पुलिस के हाँथ तो कुछ लगा ही नही था अभी तक ! इसी तरह के सवालों के घेरों के बिच कश्मकश में मैं सर झुकाये चलने लगा पता ही नही चला कब चलते चलते सुनसान सड़क पे आ पहुँचा इस सड़क को लोग ज़्यदातर दिन में ही इस्तेमाल करते है क्योकि रात के वक़्त ये सड़क सुनसान और असामाजिक तत्वों का अड्डा बन जाता है खैर यह सड़क नीलम के किनारे किनारे गुजरती है तो मेरे घर यहाँ से शार्ट कट में पड़ता है ! मैं थक हार कर उसी सड़क पर चलने लगा मन मैं निराशा लिए और बहुत सारे सवाल , तभी किसी लड़की के चिल्लाने की आवाज़ आयी मैं इधर उधर देखने लगा तभी मुझे पेड़ो के पीछे झाड़ियों के बिच मुझे हलचल दिखी फिर जोर की आवाज़ आयी बचाओ मैं दौड़ते हुए उस तरफ भागने लगा जैसे ही वहा पर पहुँचा कुछ लड़के एक लड़की को जकड़े हुए थे मैंने आओ देखा न ताओ सीधा जमीन पर पड़ा पत्थर उठा कर एक बन्दे के सर पे दे मारा बाकि के दो लड़के मेरी तरफ बढे ही थे की पास पड़ी लकड़ी उठा कर पीटना सुरु कर दिया बिना रुके एक पल भी नही रुका बस पीटता रहा उन्हें जानवरो की तरह जैसे मेरे अंदर कोई शैतान बस गया हो तीनो को पीटता रहा पिट पिट कर जब वो अधमरे से हो गए तब जा कर मेरे हाँथ रुके ! मैं पीछे पलटा और उस लड़की से पूछा आप ठीक है मैडम जैसे ही मैं उसे देखा हैरान हो गया जिसे दिन भर ढूंढ़ता रहा वो मिल गयी थी ! मैं उसकी तरफ बढ़ा - शुक्र है खुदा का  मुझे मिल गयी कितनी देर से आपको खोज रहा हूँ ! मैं बिना देर किये पुलिस को सारी बात बताया और मैं उसे वहा से चलने के लिए कहा पर वो जैसे ही आगे बढ़ी दर्द से कराह उठी शायद उन लड़को से हाँथा पाई के दौरान उसके पैरों में मोच आ गयी थी उसे उठा कर रोड की तरफ जाने लगा तभी मेरे पीछे से किसी ने मुझपे वॉर किया पलट कर देखा तो उन्ही में से एक लड़का था मेरा सर हिल गया मैंने उस लड़की को निचे उतारा और उसे भागने के लिए कहा - भागो जल्दी जाओ , तभी उसने मेरे सर पर फिर दे मारा और फिर मैं गिर गया बेहोश होने से पहले तक बस इतना देख पाया की वो उसे फिर से पकड़ लिए है और बस फिर मैं बेहोश हो गया !

होश आया तो हॉस्पिटल में था सर में काफी दर्द और शरीर में भी देखा तो पट्टी बंधी हुई थी तभी मुझे उस लड़की का ख्याल आया - मेरे साथ एक लड़की थी वो कहा है ? डॉक्टर ने सर से इशारा करके मुझे बताया मैं अपने बाजु में देखा तो वो मेरे पास ही मेरे बेड पर सर रखे सो रही थी ! क्या हुआ था इंस्पेक्टर ? तुम्हारे कॉल करने के बाद जब हम वहा पहुँचे तो ये उनसे लड़ रही थी पुलिस की सायरन की आवाज़ सुनकर वो भाग गए हमारी तलाश जारी है वो जल्द ही पकडे जायेंगे  सब लोकल लड़के ही है नशेड़ी ! मैं कितने देर से बेहोश था ? दस घंटे से तुम्हारे सर पे चोट लगी है और तुम्हारे शरीर पर चाकू से किये घाव है तुम्हे आराम करना चाहिए ! डॉक्टर सही कह रहे है तुम आराम करो हम चलते है ! 

तभी वो जाग गयी और वो खड़ी हो गयी , ऑफिसर क्या इनके परिवार वालो की कुछ खबर या इनके बारे में ? अभी तक तो नही पर हमने अखबार में इनकी फोटो दे दिया है जल्द ही कुछ पता चलता है तो आपको बता देंगे , इन्होने कुछ बताया नही आपको ? नही असल में इन्हे कुछ भी याद नही न अपने बारे में और न ही अपने फॅमिली के बारे में इसी लिए हम इन्हे महिला केंद्र में छोड़ आने वाले कुछ कागजी कार्यवाई होनी बाकि है तब तक के लिए ये यही रहेंगी हॉस्पिटल में , पर डॉक्टर ने तो कहा था की ये बिलकुल ठीक है तो फिर ये कैसे हुआ ? असल में शुरू में हमने घाव को ऊपर की तरफ से ही देखा था जो बेहद मामूली था मगर तुम्हारे यहाँ गंभीर हालत में आने के बाद और पुलिस के काफी पूछ ताछ के बाद जब ये जवाब नही दे पाई तो हमने इनके सर का MRI स्कैन किया तब जा कर हमें पता चला की इनके सर पे अंदरूनी चोट भी लगी है जिसकी वजह से इनकी याददास्त खो गयी है मगर अच्छी खबर ये है की जिस हिस्से में इन्हे चोट लगी है वहा चोट लगने पर इंसान की याददाश्त जल्द ही लौट आती है कभी ज्यादा वक़्त भी लगता है मगर ज्यादातर केसेस में याददास्त जल्दी लौट आती है ! आप लोगो से इतनी बड़ी गलती कैसे हो गयी आप डॉक्टर हो की झोला छाप जो अपने मरीज का ठीक से इलाज किये बगैर उसे डिस्चार्ज दे देता है वो भी ऐसे सीरियस मेटर में जहा किसी की ज़िन्दगी दाव पे लगी हुई है ? देखो मिस्टर यहाँ दिन भर रात भर इतने केसेस आते रहते है और वैसे भी ये सरकारी हॉस्पिटल है इससे ज्यादा आप क्या उम्मीद करते है हमने इस लड़की की जान बचाई और जब हमे लगा की यह अब ठीक है हमने डिस्चार्ज कर दिया , बस बस अब आराम करो तुम्हारे जख्मो से खून बहने लगा जो हुआ सो हुआ अब आइंदा से ऐसा न होने पाए इस तरह की घटना डॉक्टर वरना लापरवाही बरतने के जुर्म में मैं आपको अंदर कर दूंगा , ऑफिसर अगर आपको और इन्हे (लड़की) कोई ऐतराज न हो तो ये मेरे साथ रह सकती है ! इसमें हम कुछ नही कह सकते इसका फैसला तो महिला आयोग वाले ही करेंगे की ये आपके साथ रह सकती है या नही ! अब तुम आराम करो हम चलते है - ठीक है सर ! उनके जाने के बाद मैंने उसे देखा और उसने मुझे कुछ देर देखते ही देखते मुझे फिर से नींद आ गयी और मैं सो गया !


कहानी आगे जारी है। .......

नोट :- अगर आप हमसफ़र (Humsafar) का दूसरा भाग नही पढ़े है तो इस लिंक पे क्लिक करें 
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Md Danish Ansari

Wednesday, 7 February 2018

हमसफ़र - Humsafar भाग -2

February 07, 2018 0 Comments

आधे घंटे के बाद पुलिस आयी उन्होंने मेरा बयान लिया लेकिन वो बार बार इसी बात पे अटके हुए थे की तुम देर रात के बाहर दरिया के किनारे कर क्या रहे थे और मैं बार बार उन्हें यह बताता रहा की सर मुझे गर्मी लग रही थी तो मैं बस निकल गया था घर से बाहर मगर वो थे की बस उसी बात पे अटके हुए थे ! उन्होंने मुझसे पूछा उस गाड़ी का क्या जो तुमने पूल से गुजरते हुए देखा था ? मुझे क्या पता उसका क्या हुआ क्या नही ! हमारे कहने का मतलब यह  की वो कार कैसी दिखती थी उसका गाड़ी नंबर क्या था कौन सी कार थी ? सर मैं निचे था साथ ही अँधेरा भी मुझे सिर्फ इतना पता है की वो कार थी सफ़ेद रंग की मुझे कार का नंबर नहीं दिखा ! और तुमने देखने की कोशिश भी नही की ? सर कौन आदमी कार का नंबर देखते फिरता है ? अच्छा !तो फिर कौन आदमी इतनी रात के बाहर एक सुनसान जगह पर घूमने निकलता है और लौटते वक़्त अपने साथ एक अधमरी लड़की को लाता है ? सर आप खामखा मुझ पर शक कर रहे है मुझे थोड़ी पता था के मेरे साथ ये सब होने वाला है मैं तो खुद परेशान हूँ इन सब घटनाओं को लेकर उस पर से आपके ये गोलमोल सवाल मुझे और परेशान कर रहे ! देखिये मिस्टर पुलिस का काम ही है सवाल करना , मैं बस इतना कहना चाहता हूँ सर की प्लीज आप गोलमोल बात न घुमाए बल्कि जो भी पूछना है साफ़ साफ़ पूछिए !

खैर मुझसे काफी देर तक पूछ ताछ होती रही फिर उस लड़की को होश आ गया डॉक्टर ने हमें बुलाया पुलिस ने जब उससे पूछा की उसके साथ आखिर हुआ क्या था उस रात को तो वह कुछ बोली ही नही फिर उन्होंने मुझे सामने लाया और पूछा की क्या तुम इसे जानती हो उसने कहा नही तुम कहा की हो तुम्हारा घर कहा है तुम्हारे घर पता बता सकती हो ताकि हम तुम्हारे घर वालो को तुम्हारे बारे में बता सके ??? पुलिस काफी सारे सवाल करती रही मगर वो किसी भी सवाल का जवाब नही दे रही थी बस बेड पर पड़ी हुई छत की तरफ नज़रे टिकाई हुई पुलिस ने काफी कोशिश की जानकारी हाँसिल करने की मगर वह कुछ बोली ही नही ! सब बाहर आ गए तब इंस्पेक्टर ने डॉक्टर से पूछा आखिर वो कुछ बोल क्यों नही रही है ? देखिये इंस्पेक्टर ऐसा है की लड़की के सर के पीछे की तरफ चोट के निशान तो है मगर वह ज्यादा गहरे नही है लड़की इससे बेहोश तो हुई होगी और मुझे लगता है शायद वह सदमे में है इस वक़्त शायद इसी लिए वह किसी से बात ही नही कर रही है ! डॉक्टर उसे नार्मल होने में कितना टाइम लग जायेगा , कह नही सकते ? फ़िलहाल हम इसे यही हॉस्पिटल में अभी रख रहे है एक दो दिन बाद इसे डिस्चार्ज कर देंगे तब तक शायद वो कुछ हद तक सही हो जाये और आपको आपके सवालों के जवाब भी मिल जायेंगे , ठीक है डॉक्टरहम बिच बिच में आते रहेंगे और अगर आपको कोई ऐसी बात पता चलती है जो हमे जानना जरुरी है तो आप मुझे कॉल करे ! 

पुलिस वाले तो चले गए साथ ही मेरा सारा डिटेल लिए एड्रेस मोबाइल नंबर कहा काम करता हूँ कुछ फिर मुझे भी वो लोग घर छोड़ कर चले गए ! उस दिन मैंने ऑफिस कॉल करके छुट्टी ले लिया कल रात से सोया जो नही था पर मुझे नींद ही नही आ रही थी रह रह कर बस वो लड़की ही याद आती उसका चेहरा मेरे आँखों के सामने होता जब भी मैं अपनी आँख बंद करता मुझसे रहा ही नही गया और मैं शाम को फिर हॉस्पिटल के लिए निकल पड़ा !

कहानी आगे जारी है। ....

नोट :- अगर आप (हमसफ़र) Humsafar का पहला भाग नही पढ़े है तो इस लिंक पे क्लिक करें -
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Md Danish Ansari