Monday, 26 February 2018

Sanwaar Dun.....

February 26, 2018 0 Comments

Sanwaar dun sanwaar dun aaj tujhko sanwaar dun
Hai julf teri uljhi uljhi paas aa tu inhe sanwaar dun

Hai naino me tere gahra neel saagar
Abr ke kaajal se inko ko sanwaar dun

Rafta rafta meri dhadkane hai 
Aaj inse tere naam ko sanwaar dun

Tumhe dekh ke kah rahi hai ye fizaye
Aaj tum itna kaise or kyo mahakti jaaye
  
Bas gayi ho kisi ke man me
Moh rahi ho kyo har dishaye

Sanwaar dun sanwaar dun aaj tujhko sanwaar dun
Hai julf teri uljhi uljhi paas aa tu inhe sanwaar dun

Hanthon me tere hina laga dun
Suraj ki gahri laali usme mila dun

Khanak rahi hai jo hanthon me chudiyan
Aa unhe bhi jara se fulon saza dun 

Paayalo ki chhana chhan chhan
Ko aaj main bijliyon se sanwaar dun 

Sanwaar dun sanwaar dun aaj tujhko sanwaar dun
Hai julf teri uljhi uljhi paas aa tu inhe sanwaar dun 

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Md Danish Ansari

Hum Tere Diwaane.....

February 26, 2018 0 Comments

Jaha se wo gujre us gali ko mahka gaye
Jise bhi wo chhu le use bhi mahka gaye

kya itra se naha kar aayi hai wo is jahan me
yahi kahta hai har koi uska chahne wala

Barso se Qaid tha main khud khud ke andar
Mujhse mile or mujhe khud se aazad kara gaye 

Uski har ek ek ada pe sab apna dil haare hai
Kaun bacha hai shahar me jo ab bhi baki hai

Uske deedar ko khade rahte hai chauk pe diwane
Jab gujarte hai to Nazar chura chura kar dekhte hai 

Ye humse na hoga aye logo ke hum unhe bhula de
Mere to andar se bahar tak usi ki khushboo aati hai 

Wo rach bas gayi hai mujhme kuch is tarah 
Juda karna chahun to khud ko gawan baithun

Main to tera diwana hun tu qabool kar ya na kar
Tumhi se hum hai or Tumhi pe kahani khatm hai

Ye na soch ke kya kahenge ye duniya wale
Tu bas ek baar haan kah kar Aazma le mujhe

Main to bas ek tera diwana hun
Apne hi dhun me magn rahta hun

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Md Danish Ansari

Sunday, 25 February 2018

Baaten

February 25, 2018 0 Comments

khubsurat mausam hai or uspe ye raat ka pahra 
kitni bhi koshish kare teri yaaden aa hi jati hai 

khwabo ka kya hai wo to in aankhon me baste hai 
or jab teri yaad aati hai to mujhe betaab karte hai 

dekho na tapish hai itni ke har koi pareshan hai 
magar main nahi tumne julfon ka saya kiya hai

bahut din huye tumhe dekhne ki meri aarzoo hai
aaj to chand ko bhi kaale abr ne chhupa rakha hai 

kash tum kisi roz yunhi chale aao mere samne 
mujhse kaho ke oye bhul gaye ho ab tum mujhe

bahut si baaten karni hai tumse mujhe
magar jaruri hai ke tum milon pahle ki tarah

khaton ka daur khatm ho chala magar
dil ke jajbaat ab bhi wahi hai tere liye

sharmate ho kya ab bhi mera naam aa jane se
kya ab bhi wahi muskaan tere chehre pe hoti hai

kabhi miloge to bahut si baaten karunga tumse
magar afsos tere samne kuch kahte bhi nahi hai

meri nigahen tum par hoti hai tumhari mujh par
pata nahi in nigahon ne kitni baaten ki hai tumse

Wednesday, 21 February 2018

हमसफ़र - Humsafar Part-6

February 21, 2018 0 Comments

रात भर इस बारे में सोचता रहा की आखिर ये कैसे हो सकता है की जिस लड़के की सगाई हो चुकी हो वही अपनी मंगेतर का बलत्कार करे ? यह सवाल इस लिए नहीं था की मैं आइशा के किरदार पर शक कर रहा था बल्कि यह सवाल उस लड़के पे था जिसपे आइशा यानि संगीता आरोप लगा रही थी ! आप खुद ही जरा सोचिये अगर आपकी सगाई हो चुकी है और कुछ ही महीने बाद अगर आपकी शादी होने वाली है तो क्या आप कभी उस लड़की से बलत्कार करने के बारे में सोचेंगे ? 

मेरे नज़रिये से तो नहीं मगर मेरे इस बात की सहमति से संगीता के ऊपर उँगलियाँ उठेंगी इसी लिए मैंने सोचा की अपने मन में किसी के प्रति भी किसी तरह का विचार या सोच को जन्म देने से बेहतर है की उसके बारे में न सोचा जाये ! मगर लाख कोशिशों के बावजूद भी उन सभी विचारों को मैं रोकने में असमर्थ रहा रात भर बस करवटे बदलता रहा सुबह ऑफिस चला गया ! इसी तरह सप्ताह के चार दिन बीत चुके थे और रात के वक़्त मैं सोने की तैयारी कर ही रहा था की मेरे मोबाइल का रिंग बज उठा मैंने कॉल उठाया और - हेलो कौन ? इतनी जल्दी भूल गए मुझे मेरे लिए तो मुझे यह ऐसा लगता है जैसे ये अभी कल की ही बात हो ! माफ़ कीजियेगा मैंने आपको पहचाना नहीं क्या आप अपना नाम बतायेंगी ? आवाज़ भी भूल गए हो !

आगे कुछ भी कहने से पहले मैं रुका और सोचने लगा की ये कौन हो सकती है तभी मैं बोल पड़ा - तुम आइशा बोल रही हो न ? आइशा ??? आइशा कौन ? अरे मेरा मतलब था तुम संगीता बोल रही हो न ! जी हाँ ! चलो पहचान तो लिया आपने , अरे पहचानता कैसे नहीं ! बाते होती रही और फिर वो सारी बाते भी जो उसके साथ हुई और जो अभी हो रही थी ! संगीता जी अगर मैं आपसे कुछ पूछूँ तो क्या आप उसका सही और साफ़ सुथरे तरीके से जवाब देगी ? हाँ बिलकुल पूछिए ! संगीता जी ऐसा कैसे हो सकता है की जिस लड़के की सगाई हो चुकी हो और उसकी शादी होने वाली हो वह अपनी होने वाली पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार करेगा मुझे तो यकीं ही नहीं हो रहा ! मैं जानती हूँ की आपको यकीन नहीं हो रहा और यकीन मानिये ऐसा सोचने वाले सिर्फ आप अकेले नहीं है मेरे खुद के माँ बाप और रिस्तेदार भी इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे !

जब आपके अपने ही आप पर भरोशा न करें तो बताइये भला दूसरे लोग क्यों मेरी बातो पे यकीन करने लगे इसी लिए इसमें आपकी कोई गलती नहीं की आप ऐसा सोच रहे है ! मैं यह तो नहीं कहूँगी की मैं आपको यहाँ बुलाना नहीं चाहती अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए मगर मैं आपसे ये भी नहीं कहूँगी की आप यहाँ न आये अगर आप अपनी मर्जी से आते है तो मुझे अच्छा लगेगा की मेरे ज़िन्दगी और मौत के बिच आपने मुझे बचाया और एक नयी ज़िन्दगी दी और अब फिर दुबारा जब मैं मुसीबत में हूँ तो फिर से आपका मुझे साथ मिलेगा ! इसी तरह काफी देर तक बाते होती रही और रात गुजरती रही बातो के दरमियान ही मैंने यह निश्चय कर लिया की मैं वहा जरूर जाऊँगा अगर मेरे वहा होने से किसी को न्याय मिल सकता है तो मुझे जाना ही चाहिए ! अगली सुबह मैं दिल्ली के लिए निकल पड़ा। ...............

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कहानी आगे जारी है। ........

नोट :- अगर आपने हमसफ़र का पाँचवा भाग नहीं पढ़ा है तो इस लिंक पर क्लिक करें 

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Md Danish Ansari

Monday, 19 February 2018

हमसफ़र - Humsafar Part-5

February 19, 2018 0 Comments

करीब तीन साल हो चुके थे उसे यहाँ से गए हुए मेरी ज़िन्दगी पहले की तरह चल रही थी रोज सुबह ऑफिस जाना और शाम को लौट कर खुद खाना बना खा कर सो जाना एक ऐसी ज़िन्दगी जो बेहद आम सी थी नौकरी करने वाले लोगो के बिच खुद के लिए तो वक़्त ही नहीं मिलता कभी , की कभी खुद के बारे में सोच सकूँ ! इस ज़िन्दगी में सब कुछ परफेक्ट नहीं था सिवाए एक के वो था मेरा टाइम टेबल सही वक़्त पे उठना सही वक़्त पे सोना हर काम का एक टाइम बंधा हुआ था और इस टाइम टेबल में मैं ! सब कुछ था मेरे पास अच्छी नौकरी थी घर था बैंक में रुपये थे गाड़ी भी हर जरुरत का सामान मेरे पास था मगर फिर भी खुश नहीं था न अपने अपने आप से और न ही अपने काम और न ही अपनी इस ज़िन्दगी से, रविवार को घर पे अकेला होता तो टीवी देख लेता हॉलीवुड उसके सिवा कभी घूमने निकल जाता तो कुछ दोस्तों से मिल आता ! एक वही तो थे जो मेरा अकेलापन समझते है !

रविवार की रात को मेरे घर पर दस्तक हुई दरवाजा खोला तो इंस्पेक्टर साहब बाहर खड़े हुए थे ! अरे सर आप बताइये कैसे आना हुआ अचानक से यहाँ आने की वजह ? असल में ! अरे अंदर आइये न अंदर बैठ कर बाते करते है ! मैं इस बात से उस वक़्त पूरी तरह अनजान था की मैं किस तूफ़ान को अपने घर के अंदर ला रहा हूँ जो हमेशा के लिए अब मेरी ज़िन्दगी बदल के रख देगा और इन सभी बातो से अनजान मैं उन्हें अंदर ले आया ! क्या लेंगे सर कॉफ़ी या चाय ? अरे नहीं कुछ नहीं दरअसल मैं यहाँ कुछ काम से आया था !  काम से वो भी मुझसे कहिये ? तुम्हे वो लड़की याद संगीता है जिसे तुमने बचाया था ? जी हाँ क्या हुआ उसे वो ठीक तो है न ! नहीं ? मतलब उसे कुछ हुआ है क्या ? दरअसल उसकी खोई हुई याददास्त एक हफ्ते पहले ही वापस लौट आयी है और यही वजह है की मैं तुम्हारे पास आया हूँ मुझे दिल्ली कोर्ट से आर्डर आया है की हम तुम्हे वहा पेश करें ! मुझे पर क्यों ? तुम गवाह हो उस घटना के और तुम्हारी गवाही बेहद अहम् है कोर्ट के लिए ! मगर मामला क्या है ? 

उस घटना से कुछ महीने पहले उस लड़की की सगाई हुई थी और फिर वो लड़की हमे यहाँ मिली अधमरी हालत में अब जब लड़की की याददास्त लौट आयी है तो वह लड़के पे आरोप लगा रही है की उसने उसका बलत्कार किया था और मैं किसी को बता न दूँ इस बारे में इसलिए डर के मारे उसने उसे जान से मारने की पूरी कोशिश की मगर उसकी किश्मत अच्छी थी की वो बच गयी ! पर ऐसा कैसे हो सकता इंस्पेक्टर ? जब मैं उस लड़की को नदी से बाहर निकाल के लाया था तो उसकी के कपडे बिलकुल सही थे कही से फटे नहीं थे उसके जिस्म पे कुछ खरोंचे तो हम सबने देखा था मगर किसी ने भी इस बात पे कुछ कहा नहीं और फिर सबसे बड़ा सवाल तो ये भी है की यहाँ के डॉक्टर ने खुद आपसे कहा था की लड़की के साथ किसी तरह का सेक्सटुअल इंटरकोर्स नहीं हुआ फिर अचानक से यह सब कैसे ? यही तो सवाल है ? जिसका जवाब दिल्ली से यहाँ तक ढूंडा जा रहा है हमने डॉक्टर को हिरासत में ले लिया है और कोर्ट ने तुम्हे भी पेश करने को कहा है ! यानि आप मुझे गिरफ्तार करने आये है नहीं फिलहाल तो नहीं मैं तुम्हे कोर्ट के आर्डर देने आया हूँ अब देख लो तुम्हे अगर जाना है तो जाओ वरना मत जाओ पर एक बार अच्छे से जरूर सोच लेना क्योकि यहाँ किसी की ज़िन्दगी और इन्साफ का सवाल है और तुम उन सभी कड़ी में से एक कड़ी हो जिसके बगैर सवालो के जवाबों तक नहीं पहुंचा जा सकता ! मुझे कुछ वक़्त चाहिए इंस्पेक्टर सोचने के लिए उसके बाद ही मैं कुछ कह सकता हूँ ! ठीक है मैं अब चलता हूँ वैसे केस की अगली सुनवाई एक हफ्ते बाद है अब तुम सोच लो के तुम्हे जाना है या नहीं !

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कहानी आगे जारी है ...........

नोट :- अगर आपने हमसफ़र का चौथा भाग नहीं पढ़ा है तो इस लिंक पर क्लिक करें 
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Md Danish Ansari

Saturday, 17 February 2018

मूरत .....

February 17, 2018 0 Comments

जल रहा है क्यों चाँद और बुझ गया क्यों सूरज 
प्यासी है क्यों नदियाँ और आँखे क्यों है नम 
ए बादल तु क्यों न बरसे ज़मी को पानी चाहिए 
तप रही ज़मी बुखार से इसे शीतल हवा चाहिए
झुलस गए पेड़ पौधे सुख गयी डाल की हर पत्ती 
ये कैसे हुआ क्यों हुआ यह सवाल हर नज़र पूछती 
ए आसमान क्या तेरे सीने में दिल नहीं है 
नहीं पसीजता जो तेरा दिल तो नम आँखों से
चंद क़तरे बहा दे 
समंदर में है पानी बहुत मगर वो भी तो खारा है 
खुद नदियों से प्यास बुझाये वो भी उम्मीद हारा है 
तड़प तड़प कर मचल रही गर्म हवा गलियारों में 
धमक धमक के उड़ रही है ख़ाक आसमानो में 
धीरे धीरे सब कुछ यहाँ टूट टूट कर बिखर रहा है 
आसमान जल कर गिर रहा तेरे खतों की तरह 
सुख गयी ज़मी उसमे दरारे पड़ गए आईने की तरह 
चाँद काला पड़ गया आसुओं में बहे चेहरे की तरह 
मोहब्बत उल्फत आरज़ू जुस्तजू और फिर शिकायत 
वफ़ा सदाकत सफर शहर ख़ाक और नज़ाकत 
ख्वाब तमन्ना दास्तान और मेरी धड़कन सब कुछ 
यह सब कुछ मिला कर जो मूरत बनी वो तुम थी 
यह सब कुछ मिला कर जो मूरत बनी वो तुम थी 

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Md Danish Ansari

Thursday, 15 February 2018

कसूर .....

February 15, 2018 0 Comments

कुछ तेरी निगाहों का कसूर था कुछ मेरी नज़रों का 
हम तुम यूँही बदनाम हो गए ज़माने में ये खेल दो धड़कते दिलों का था 
हुश्न तो यूँही बेवजह बेवफा हो गयी ज़माने में 
हमने तेरे हुश्न से नही सिर्फ एक तुझसे मोहब्बत किया था 
क्या क्या संभालता मैं भला दिल ,जान ,नज़र और क्या क्या 
मैं तो तेरे पाज़ेब की झनक पे ही दिल हार बेठा था 
तू रुसवा न हो जाये कही ज़माने में इसलिए मैंने 
हर इलज़ाम हर खता खुद पर ही सहरा की तरह पहना था 
ये न कह दे कोई के तुझमे कोई बुराई है 
मैंने खुद को ही दुसरो की नज़रों में गिराए रखा था 
मत सोचो तुम के लोग क्या कहेंगे 
लोग तो खुद ये सोच रहे है की फलाना क्या कहेगा 
आ तू फिर से मेरी बाँहों में ,और टूट के बिखर जा 
आ फिर से मैं तुझपे कोई नई दास्तान लिखूंगा 
कसूर किसका था ये सोचने में वक़्त जाया न कर 
आ जल्दी से सुलह करे मोहब्बत के पल जाया न कर 
उम्र लग जाएगी कसूर और कसूरवारो की तलाश में 
क्यों तड़पे हम खुद एक दुसरे की मोहब्बत की प्यास में 

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Md Danish Ansari